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हजारीबाग के टाटीझरिया प्रखंड में जंगली हाथियों और इंसानों के बीच बढ़ता संघर्ष अब ग्रामीणों की जान और आजीविका दोनों के लिए खतरा बन गया है. जंगल से निकलकर आबादी वाले इलाकों में पहुंच रहे हाथियों के झुंड ने कई गांवों में तबाही मचा रखी है. पिछले साढ़े पांच वर्षों में हाथियों के हमलों में पांच लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि मकानों, चहारदीवारी और फसलों को हुए नुकसान का आंकड़ा 50 लाख रुपये से अधिक बताया जा रहा है. ताजा घटना में रविवार को गोधिया गांव के पेन्दवा जंगल में 65 वर्षीय महाबीर गोप की जान चली गई. इस घटना के बाद इलाके में एक बार फिर दहशत का माहौल है.
हाथियों की आवाजाही अब केवल जंगलों तक सीमित नहीं रह गई है. रात के समय झुंड गांवों में घुसकर घरों को नुकसान पहुंचा रहे हैं. खेतों में तैयार धान, मकई और सब्जियों की फसलें रौंदी जा रही हैं. कई बार हाथी घरों में घुसकर अनाज और राशन भी नष्ट कर देते हैं. ऐसे में ग्रामीणों के सामने दोहरी परेशानी है. एक तरफ जान बचाने की चिंता है, तो दूसरी ओर खेती पर निर्भर परिवारों की आमदनी पर संकट गहरा रहा है. हाथियों के डर से जंगल और खेतों तक जाना भी जोखिम भरा हो गया है.
पांच घटनाओं में पांच ग्रामीणों की मौत
टाटीझरिया में हाथियों के हमलों से मौत का सिलसिला पिछले कई वर्षों से जारी है. उपलब्ध घटनाओं के अनुसार, 18 फरवरी 2021 को अमनारी जंगल में केसड़ा निवासी 60 वर्षीय सरस्वती देवी की हाथियों ने कुचलकर जान ले ली थी. इसके करीब ढाई साल बाद 12 अगस्त 2023 को बेडमक्का जंगल में मशरूम चुनने गए झरपो निवासी 75 वर्षीय रामेश्वर ठाकुर हाथियों के हमले का शिकार हो गए.
वर्ष 2025 में दो और ग्रामीणों की जान गई. 5 मई को सिमराढाब जंगल में 60 वर्षीय दशमी देवी की हाथी के हमले में मौत हो गई. वहीं, 11 जून को अमनारी जंगल के पास खंभवा निवासी 49 वर्षीय लाजवंती देवी को हाथी ने कुचल दिया था. अब 1 नवंबर 2026 को पेन्दवा जंगल में महाबीर गोप की मौत के साथ ही इस क्षेत्र में हाथियों के हमलों में जान गंवाने वाले ग्रामीणों की संख्या पांच हो गई है.
फसल से लेकर मकानों तक को भारी नुकसान
हाथियों के झुंड ने ग्रामीणों की संपत्ति को भी बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया है. कई जगह पक्के और कच्चे मकानों को क्षतिग्रस्त किया गया है, जबकि चहारदीवारी भी तोड़ी गई है. घरों में रखे खाद्यान्न और दूसरी जरूरी सामग्री को हाथी बर्बाद कर रहे हैं. इसके अलावा खेतों में लगी धान, मकई और सब्जियों की फसलें भी लगातार निशाने पर हैं.
ग्रामीणों के मुताबिक, मकानों, चहारदीवारी और कृषि उपज को मिलाकर अब तक 50 लाख रुपये से अधिक का नुकसान हो चुका है. खेती-किसानी से परिवार चलाने वाले लोगों के लिए यह क्षति गंभीर आर्थिक परेशानी का कारण बन रही है. फसल बर्बाद होने से आमदनी प्रभावित हो रही है और रात में हाथियों के गांव में पहुंचने की आशंका के कारण लोग भय के माहौल में रहने को मजबूर हैं.
वन विभाग से स्थायी सुरक्षा व्यवस्था की मांग
लगातार हो रही घटनाओं ने वन विभाग की निगरानी और हाथी प्रभावित गांवों में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं. ग्रामीण चाहते हैं कि हाथियों की आवाजाही वाले रास्तों को चिह्नित कर नियमित निगरानी की जाए. साथ ही, हाथियों के गांव की ओर बढ़ने पर समय रहते सूचना देने की व्यवस्था हो, ताकि लोग सुरक्षित स्थानों पर जा सकें.
ग्रामीणों ने प्रभावित इलाकों में प्रशिक्षित टीम की तैनाती और नुकसान झेलने वाले परिवारों को उचित मुआवजा देने की जरूरत भी जताई है. महाबीर गोप की मौत ने मानव-हाथी संघर्ष की गंभीरता एक बार फिर सामने ला दी है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि लगातार जान-माल का नुकसान झेल रहे टाटीझरिया के गांवों को हाथियों के आतंक से राहत कब मिलेगी.









