राजधानी के मेन रोड स्थित ऐतिहासिक दुर्गाबाड़ी में विजयादशमी के दिन बंगाली परंपरा के अनुरूप सिंदूर खेला का आयोजन किया गया। इस दौरान महिलाओं ने मां दुर्गा की पूजा कर उन्हें सिंदूर अर्पित किया और एक-दूसरे के माथे व गालों पर सिंदूर लगाकर पर्व की खुशियां साझा कीं। उत्सव के बीच मां की विदाई ने श्रद्धालुओं को भावुक भी कर दिया। भक्तों ने मां दुर्गा से अगले वर्ष दोबारा आने की प्रार्थना की।

1883 से कायम है दुर्गा पूजा की परंपरा
दुर्गाबाड़ी रांची की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का प्रमुख केंद्र है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, यहां वर्ष 1883 में बंगाली समुदाय के लोगों ने दुर्गा पूजा की शुरुआत की थी। तब से यहां पारंपरिक बंगाली रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा आयोजित की जाती है। विजयादशमी पर होने वाला सिंदूर खेला इस आयोजन का विशेष आकर्षण रहता है।
सुहाग और सुख-समृद्धि की कामना से जुड़ी रस्म
बंगाली संस्कृति में सिंदूर खेला का धार्मिक और सामाजिक महत्व है। इस परंपरा के तहत सुहागिन महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर चढ़ाने के बाद एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। इसके माध्यम से वे वैवाहिक जीवन की खुशहाली, परिवार की समृद्धि और सुख-सौभाग्य की कामना करती हैं। यह रस्म महिलाओं के बीच आपसी स्नेह और एकजुटता का भी प्रतीक मानी जाती है।
मां की विदाई पर भावुक हुआ माहौल
बंगाली मान्यता में मां दुर्गा को बेटी के रूप में देखा जाता है, जो कुछ दिनों के लिए मायके आती हैं। विजयादशमी पर उनकी विदाई परिवार की बेटी को विदा करने जैसी भावना से जुड़ी होती है। दुर्गाबाड़ी में भी सिंदूर खेला के दौरान महिलाओं के चेहरों पर उत्साह के साथ विदाई की उदासी दिखाई दी।
सिंदूर से सजे चेहरे, धार्मिक जयकारे और महिलाओं की भागीदारी ने पूरे परिसर को उत्सवी रंग में रंग दिया। पूजा के समापन पर श्रद्धालुओं ने मां दुर्गा से अपने परिवार और समाज में सुख, शांति एवं समृद्धि बनाए रखने की प्रार्थना की।
सिंदूर खेला के साथ दुर्गाबाड़ी में दुर्गोत्सव का समापन हुआ। इस आयोजन ने एक बार फिर रांची में बंगाली संस्कृति और सदियों से चली आ रही धार्मिक परंपराओं की जीवंत झलक पेश की। मां की विदाई के साथ श्रद्धालुओं के मन में अगले वर्ष उनके पुनः आगमन की उम्मीद बनी रही।






