झारखंड के गुमला जिले से वर्ष 2018 में लापता हुई छह वर्षीय बच्ची का अब तक पता नहीं चलने पर झारखंड हाईकोर्ट ने पुलिस की जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। शुक्रवार को मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने गुमला एसपी की भूमिका और जांच की निगरानी पर असंतोष जताया। कोर्ट ने पूछा कि क्या इतने संवेदनशील मामले में जांच का यही तरीका होना चाहिए? साथ ही जांच में देरी और पर्यवेक्षण में कथित लापरवाही को लेकर एसपी से स्पष्टीकरण मांगा है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस की कार्रवाई में कई खामियों की ओर ध्यान दिलाया। मुख्य संदिग्ध पर संदेह होने के बावजूद उसके खिलाफ प्रभावी कदम नहीं उठाए जाने पर कोर्ट ने सवाल किया। पुलिस हिरासत में लेकर पूछताछ की मांग करने में चार महीने से अधिक का समय लगने, संदिग्ध का एफएसएल परीक्षण नहीं कराने और उससे पर्याप्त पूछताछ नहीं होने पर भी नाराजगी जाहिर की गई।
अदालत ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि संदिग्ध को 15 दिनों तक गुजरात के गांधीनगर ले जाकर जांच करने के बावजूद मामले में कोई ठोस प्रगति क्यों नहीं हुई। कोर्ट ने टिप्पणी की कि आठ साल बीत जाने के बाद भी बच्ची का पता नहीं चलना बेहद गंभीर है। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि पूरे मामले को देखकर ऐसा लगता है कि राज्य सरकार इसे अपेक्षित गंभीरता से नहीं ले रही है।
फैक्ट फाइंडिंग कमेटी की रिपोर्ट पर भी उठे सवाल
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति अखिल कुमार की खंडपीठ में हुई। इससे पहले की सुनवाई में फैक्ट फाइंडिंग कमेटी की रिपोर्ट पर बच्ची की मां की ओर से आपत्ति दर्ज कराई गई थी। मां ने अपनी बेटी की तलाश और उसे अदालत के समक्ष पेश कराने की मांग को लेकर हाईकोर्ट में हैबियस कॉर्पस याचिका दाखिल की है।
अब हाईकोर्ट की सख्ती के बाद गुमला पुलिस की जांच और एसपी की निगरानी को लेकर दिए जाने वाले स्पष्टीकरण पर सबकी नजर है।






