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अध्यक्ष और सदस्यों के बिना ठप JPSC, नौ परीक्षाएं अटकीं; हाईकोर्ट के आदेश पर सरकार की नजर

by उर्वशी शेखर
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झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) में नेतृत्व और सदस्यों की नियुक्ति का इंतजार लंबा होता जा रहा है। अध्यक्ष का पद 21 जुलाई से खाली है, जबकि आयोग के तीन अन्य सदस्यों ने भी 9 अगस्त को इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद से आयोग नियमित कामकाज करने की स्थिति में नहीं है। इसका सीधा असर राज्य की प्रतियोगी परीक्षाओं के आयोजन से लेकर सरकारी अधिकारियों और विश्वविद्यालय शिक्षकों की प्रोन्नति तक पर पड़ रहा है।

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पूर्व मुख्य सचिव एल खियांग्ते ने विवादों के बीच JPSC अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया था। इसके बाद आयोग के अन्य तीन सदस्यों ने भी पद छोड़ दिया। नतीजतन आयोग में न अध्यक्ष बचे और न सदस्य। इस स्थिति पर झारखंड हाईकोर्ट पहले ही चिंता जता चुका है। 6 अगस्त को एक परीक्षा संबंधी याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा था कि संवैधानिक संस्था के अध्यक्ष का पद लंबे समय तक खाली नहीं रहना चाहिए।

इसके बाद 10 सितंबर को मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की पीठ ने राज्य सरकार को दो महीने के भीतर अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति कर आयोग के पुनर्गठन का निर्देश दिया। अदालत ने सरकार से 18 नवंबर तक अनुपालन रिपोर्ट मांगी है। इस मामले में 19 नवंबर को अगली सुनवाई निर्धारित है। हालांकि, सरकार की ओर से आयोग के पुनर्गठन के संकेत मिलने के बावजूद अब तक नियुक्तियां नहीं हो सकी हैं। अध्यक्ष पद के लिए उपयुक्त नाम पर सहमति नहीं बन पाने को इसकी प्रमुख वजह माना जा रहा है।

परीक्षा सुधार के लिए बनी कमेटी भी अब तक निष्क्रिय

JPSC और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) की परीक्षाओं में सामने आई गड़बड़ियों, भ्रष्टाचार और प्रक्रियागत खामियों को दूर करने के लिए राज्य सरकार ने 18 अगस्त को एक उच्चस्तरीय सुधार समिति बनाने का फैसला किया था। IAS अधिकारी अमिताभ कौशल की अध्यक्षता में गठित इस समिति को दो महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपनी थी।

कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग ने समिति के गठन को लेकर अधिसूचना जारी की थी। इसके सुचारु संचालन के लिए विभिन्न अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति और प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों के विशेषज्ञों को शामिल किया जाना था। इसके लिए अलग से अधिसूचना जारी होनी थी। लेकिन तय समय सीमा बीतने के बाद भी समिति पूरी तरह गठित होकर काम शुरू नहीं कर सकी। ऐसे में प्रतियोगी परीक्षाओं की प्रक्रिया और मानक संचालन नियमावली (SOP) में सुधार का प्रस्ताव भी आगे नहीं बढ़ पाया है।

नौ प्रमुख परीक्षाओं का आयोजन प्रभावित

आयोग के निष्क्रिय रहने से कई भर्ती परीक्षाओं की प्रक्रिया अटकी हुई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, कम से कम नौ प्रमुख परीक्षाएं सीधे तौर पर प्रभावित हैं। इनमें संयुक्त सिविल सेवा मुख्य परीक्षा-2023 और 2025, संयुक्त सिविल सेवा मुख्य परीक्षा-2025 (बैकलॉग), सिविल जज (जूनियर डिवीजन) लिखित परीक्षा, सहायक लोक अभियोजक की नियमित और बैकलॉग परीक्षाएं, कारखाना निरीक्षक, प्रोजेक्ट मैनेजर और वाष्पित्र निरीक्षक (बॉयलर इंस्पेक्टर) की परीक्षाएं शामिल हैं।

इनमें से कई परीक्षाएं पहले ही स्थगित की जा चुकी हैं, जबकि कुछ रद्द प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मामले हाईकोर्ट में लंबित हैं। आयोग के दोबारा सक्रिय होने पर स्थगित परीक्षाओं के आयोजन और आगे की चयन प्रक्रिया को गति मिलने की उम्मीद है। इसके अलावा, आयोग से जुड़ी अन्य लंबित प्रक्रियाओं पर भी असर पड़ा है।

विश्वविद्यालय शिक्षकों की प्रोन्नति भी अटकी

JPSC का काम केवल प्रतियोगी परीक्षाएं आयोजित करने तक सीमित नहीं है। राज्य में प्रथम श्रेणी के अधिकारियों और विश्वविद्यालयों के शिक्षकों की प्रोन्नति के मामलों में भी आयोग की अनुशंसा जरूरी होती है। अध्यक्ष और सदस्यों के नहीं रहने से विश्वविद्यालयों में एसोसिएट प्रोफेसर से प्रोफेसर पद पर पदोन्नति की प्रक्रिया लंबित है। वर्ष 2008 बैच के कई शिक्षकों की प्रोन्नति भी प्रभावित हुई है।

इस तरह आयोग में नियुक्तियों की देरी का असर भर्ती, प्रशासनिक पदोन्नति और उच्च शिक्षा संस्थानों तक पहुंच गया है। अब सबकी नजरें 18 नवंबर तक सरकार की ओर से हाईकोर्ट में पेश की जाने वाली अनुपालन रिपोर्ट और 19 नवंबर को होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं।

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