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डॉ. राममनोहर लोहिया पुण्यतिथि विशेष : सिद्धांतों की ऐसी मिसाल! इलाज के लिए भी लोहिया ने नहीं बदले अपने उसूल

by उर्वशी शेखर
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समाजवादी विचारधारा के प्रखर चिंतक और गांधीवादी राजनीति के प्रमुख स्तंभ डॉ. राममनोहर लोहिया की आज 12 अक्टूबर को पुण्यतिथि है। 1967 में इसी दिन उनका निधन हो गया था। लोहिया का राजनीतिक जीवन जितना संघर्षपूर्ण रहा, उनके सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्धता भी उतनी ही अडिग थी। उनके जीवन से जुड़ा एक प्रसंग आज भी चर्चा में आता है, जिसके मुताबिक बेहतर इलाज के लिए जरूरी 12 हजार रुपये जुटाने में हुई देरी और अस्पताल में कथित अव्यवस्थाओं ने उनकी जान बचाने की उम्मीदों को कमजोर कर दिया था।

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हैदराबाद में लोहिया को याद करते हुए लोहिया विचार मंच के अध्यक्ष और सेवानिवृत्त सिविल जज टी. गोपाल सिंह ने उनके जीवन के इस प्रसंग का जिक्र किया। उनके अनुसार, लोहिया ने इलाज के लिए धन जुटाने के मामले में भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। गोपाल सिंह का कहना है कि यदि समय रहते बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध हो जाती, तो संभव है कि देश इस बड़े समाजवादी नेता को खोने से बच जाता।

इलाज के लिए जर्मनी जाने की थी योजना

टी. गोपाल सिंह के मुताबिक, वर्ष 1967 में डॉ. लोहिया बढ़ी हुई प्रोस्टेट ग्रंथि की समस्या से जूझ रहे थे। उस समय वह लोकसभा के सदस्य थे और उनकी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी कई राज्यों में सरकार में भी थी। लोहिया जर्मनी के एक अस्पताल में ऑपरेशन कराना चाहते थे। इसके लिए करीब 12 हजार रुपये की जरूरत थी।

बताया जाता है कि लोहिया ने धन जुटाने के लिए स्पष्ट शर्त रखी थी कि उनकी पार्टी की सरकार वाले राज्यों से पैसा नहीं लिया जाए। वह नहीं चाहते थे कि उनके निजी इलाज के लिए उन सरकारों के संसाधनों का इस्तेमाल हो, जिन पर उनकी पार्टी की जिम्मेदारी थी।

मजदूरों से चंदा जुटाने की कोशिश

लोहिया ने मुंबई में समाजवादी आंदोलन से जुड़े एक मजदूर नेता को यह जिम्मेदारी सौंपी थी कि वह मजदूरों से चंदा एकत्र कर आवश्यक रकम जुटाएं। हालांकि, तय समय पर पूरी राशि जमा नहीं हो सकी। इसी बीच उनकी तबीयत बिगड़ने लगी।

गोपाल सिंह के अनुसार, जर्मनी की एक यूनिवर्सिटी ने लोहिया के आने-जाने की व्यवस्था भी कर दी थी। वहां उन्हें एक भाषण देना था और साथ ही बेहतर अस्पताल में ऑपरेशन कराने की योजना थी। लेकिन बीमारी बढ़ने के कारण उन्हें दिल्ली के वेलिंगटन नर्सिंग होम में भर्ती कराना पड़ा।

ऑपरेशन के बाद संक्रमण बना जानलेवा

दिल्ली में डॉ. लोहिया की प्रोस्टेट ग्रंथि का ऑपरेशन किया गया। बताया जाता है कि ऑपरेशन के बाद उन्हें संक्रमण हो गया। अस्पताल में कथित बदइंतजामी और बिगड़ती सेहत के बीच उनकी हालत लगातार गंभीर होती गई। आखिरकार 12 अक्टूबर 1967 को उनका निधन हो गया।

टी. गोपाल सिंह के मुताबिक, इलाज के लिए जरूरी रकम का समय पर इंतजाम हो जाता और उन्हें बेहतर चिकित्सा सुविधा मिलती, तो उनकी जान बचने की संभावना हो सकती थी। उनके अनुसार, महज 12 हजार रुपये की व्यवस्था न हो पाना देश के लिए एक बड़ी राजनीतिक और वैचारिक क्षति साबित हुआ।

डॉ. राममनोहर लोहिया ने अपने विचारों, राजनीतिक संघर्ष और सादगीपूर्ण जीवन से भारतीय राजनीति पर गहरी छाप छोड़ी। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना उस समाजवादी सोच और सिद्धांतनिष्ठ राजनीति को भी स्मरण करना है, जिसके लिए उन्होंने जीवनभर संघर्ष किया।

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