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लाल आतंक पर आखिरी वार की तैयारी! झारखंड में बचे नितेश यादव, मनोहर गंझू समेत ये नक्सली

by उर्वशी शेखर
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झारखंड में नक्सल विरोधी अभियान अब निर्णायक चरण में पहुंचने का दावा किया जा रहा है। पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई, मुठभेड़ों में शीर्ष नक्सलियों के मारे जाने तथा कई उग्रवादियों के आत्मसमर्पण से प्रतिबंधित संगठनों की ताकत काफी कमजोर हुई है। सुरक्षा एजेंसियों के आकलन के मुताबिक, राज्य में अब दस इनामी नक्सली सक्रिय चुनौती बने हुए हैं। हालांकि, उपलब्ध सूची में नौ नाम ही दर्ज हैं।

एक करोड़ रुपये तक का इनाम झेल रहे मिसिर बेसरा और असीम मंडल जैसे बड़े नक्सली नेताओं के खिलाफ कार्रवाई के बाद सुरक्षा एजेंसियों का ध्यान अब शेष कमांडरों और उनके नेटवर्क पर केंद्रित है। अधिकारियों के अनुसार, नक्सलियों से लूटे गए हथियारों में से 99.9 प्रतिशत की बरामदगी भी हो चुकी है। इसे राज्य में नक्सल विरोधी अभियान की बड़ी उपलब्धियों में गिना जा रहा है।

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संयुक्त अभियानों से कमजोर पड़े नक्सली संगठन

झारखंड पुलिस, सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन और झारखंड जगुआर के संयुक्त अभियानों ने पिछले कुछ वर्षों में नक्सली संगठनों पर दबाव बढ़ाया है। लगातार कार्रवाई के कारण उनके शीर्ष नेतृत्व, स्थानीय नेटवर्क और हथियारबंद दस्तों की क्षमता प्रभावित हुई है।

एक करोड़ रुपये के इनामी विवेक उर्फ प्रयाग मांझी और अनुज उर्फ सहदेव सोरेन जैसे बड़े नामों के खिलाफ हुई कार्रवाई ने भी नक्सली संगठनों को झटका दिया। कई अन्य प्रमुख उग्रवादियों के मारे जाने, गिरफ्तार होने या आत्मसमर्पण करने से संगठनात्मक ढांचे को नुकसान पहुंचा है।

दूसरी ओर, सरकार की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति के तहत नक्सलियों को हिंसा का रास्ता छोड़कर सामान्य जीवन में लौटने का विकल्प दिया जा रहा है। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, शीर्ष नक्सली कमांडरों के अंगरक्षकों से लेकर सब-जोनल और एरिया कमांडरों तक ने हथियार छोड़े हैं। इन घटनाओं ने नक्सली संगठनों की ताकत सीमित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

इनामी नक्सलियों की सूची में कौन-कौन शामिल?

राज्य में शेष बताए जा रहे इनामी उग्रवादियों में भाकपा माओवादी, तृतीय सम्मेलन प्रस्तुति कमेटी (टीएसपीसी) और पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएलएफआई) से जुड़े नाम शामिल हैं। उपलब्ध विवरण के अनुसार, इनकी सूची इस प्रकार है:

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अब शेष नेटवर्क को खत्म करना बड़ी चुनौती

नक्सल विरोधी अभियानों में मिली सफलताओं के बावजूद सुरक्षा बलों के सामने शेष उग्रवादियों की तलाश और उनके नेटवर्क को तोड़ने की चुनौती बनी हुई है। दुर्गम इलाकों में गतिविधियों पर नजर रखना, हथियारों की बरामदगी सुनिश्चित करना और नक्सली संगठनों को दोबारा मजबूत होने से रोकना अभियान के अहम हिस्से हैं।

सुरक्षा एजेंसियों के आकलन में झारखंड में नक्सलवाद का प्रभाव काफी घटने की बात कही जा रही है। हालांकि, किसी क्षेत्र को पूरी तरह नक्सलमुक्त मानने के लिए शेष उग्रवादियों की गतिविधियों, संगठनात्मक नेटवर्क और जमीनी हालात की पुष्टि जरूरी होगी।

फिलहाल, शीर्ष नक्सली नेतृत्व के कमजोर पड़ने और लगातार चल रहे अभियानों ने राज्य में नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई को नए मोड़ पर पहुंचा दिया है। अब अभियान की सफलता इस बात से तय होगी कि सुरक्षा बल शेष सक्रिय उग्रवादियों और उनके नेटवर्क पर कितनी प्रभावी कार्रवाई कर पाते हैं।

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