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बिहार MLC चुनाव के बाद NDA में बढ़ी खींचतान, तीन सीटों पर हार से JDU नाराज; BJP की भूमिका पर उठे सवाल

by उर्वशी शेखर
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बिहार में विधान परिषद चुनाव के नतीजों ने एनडीए के भीतर सियासी समीकरणों को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। खासकर जनता दल यूनाइटेड (JDU) की तीन सीटों पर हार और इसके बाद दो विजयी निर्दलीय उम्मीदवारों की भारतीय जनता पार्टी (BJP) से बढ़ती नजदीकी ने गठबंधन के अंदर असहजता बढ़ा दी है। जदयू की नाराजगी केवल चुनावी प्रदर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि सहयोगी दलों की भूमिका और चुनाव के दौरान आपसी तालमेल को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

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विवाद को तब और हवा मिली, जब जदयू उम्मीदवारों को हराने वाले सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के राहुल राज और तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के बंशीधर बृजवासी ने 31 अक्टूबर को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात की। दोनों नेता भाजपा विधायक दल की बैठक में भी पहुंचे। इससे उनके भाजपा में शामिल होने की अटकलें लगने लगीं। हालांकि, बाद में राहुल राज और बंशीधर बृजवासी ने पार्टी की औपचारिक सदस्यता लेने की खबरों को खारिज किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे एनडीए सरकार को अपना समर्थन दे रहे हैं। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने भी इसी बात की पुष्टि की।

इस घटनाक्रम ने जदयू के सामने राजनीतिक असहजता की स्थिति पैदा कर दी है। पार्टी के लिए यह सवाल अहम हो गया है कि जिन निर्दलीय उम्मीदवारों ने उसके अधिकृत प्रत्याशियों को चुनाव में शिकस्त दी, उन्हें चुनाव के बाद भाजपा के साथ इतनी नजदीकी कैसे मिली। विपक्ष भी इस पूरे मामले को लेकर एनडीए पर निशाना साध रहा है।

तीन सीटों पर हार ने खोली संगठन और तालमेल की पोल?

विधान परिषद की आठ सीटों के चुनाव में भाजपा और जदयू के बीच चार-चार सीटों पर उम्मीदवार उतारने का समझौता हुआ था। लेकिन परिणाम जदयू के लिए निराशाजनक रहे। पार्टी अपने हिस्से की चार सीटों में से केवल एक पर जीत हासिल कर सकी, जबकि तीन सीटों पर उसे हार का सामना करना पड़ा।

इनमें सारण शिक्षक और तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के नतीजे सबसे अधिक चर्चा में रहे। सारण में निर्दलीय राहुल राज ने जदयू के आनंद पुष्कर को 1,815 मतों से पराजित किया। वहीं, तिरहुत स्नातक सीट पर बंशीधर बृजवासी ने जदयू प्रत्याशी अभिषेक झा को 9,147 मतों के बड़े अंतर से हराया। बृजवासी ने इस सीट पर लगातार दूसरी बार जीत दर्ज कर अपनी राजनीतिक पकड़ भी साबित की।

इन परिणामों के बाद जदयू के भीतर चुनावी तैयारियों और संगठनात्मक मजबूती को लेकर मंथन शुरू हो गया है। पार्टी से जुड़े नेताओं की शिकायत है कि गठबंधन के स्तर पर चुनाव प्रचार और समर्थन को लेकर जो सहमति बनी थी, उसका अपेक्षित असर मतदान के दौरान नहीं दिखा। उनका आरोप है कि भाजपा के सांसदों, विधायकों और स्थानीय नेताओं को जदयू प्रत्याशियों के पक्ष में सक्रिय होना था, लेकिन जमीनी स्तर पर वैसा सहयोग नहीं मिला।

निर्दलीय उम्मीदवारों की जीत के बाद BJP की सक्रियता चर्चा में

चुनाव के बाद राहुल राज और बंशीधर बृजवासी की भाजपा नेताओं के साथ बढ़ती नजदीकी ने इस विवाद को नया राजनीतिक आयाम दे दिया है। दोनों ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़कर एनडीए के आधिकारिक उम्मीदवारों को हराया था। इसके बावजूद नतीजे आने के तुरंत बाद भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के साथ उनकी मुलाकात और विधायक दल की बैठक में भागीदारी को सामान्य राजनीतिक घटनाक्रम के तौर पर नहीं देखा जा रहा है।

हालांकि, दोनों नेताओं ने भाजपा की सदस्यता लेने से इनकार किया है, लेकिन एनडीए सरकार को समर्थन देने के उनके फैसले ने गठबंधन के भीतर राजनीतिक संदेश को लेकर बहस तेज कर दी है। जदयू के लिए यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि चुनाव में हार के बाद अब उसके प्रतिद्वंद्वी निर्दलीय उम्मीदवार सत्ता पक्ष के साथ खड़े नजर आ रहे हैं।

विधानसभा चुनाव की रणनीति पर भी उठने लगे सवाल

एमएलसी चुनाव के इस घटनाक्रम ने एनडीए के भीतर सहयोगी दलों के बीच भरोसे और चुनावी समन्वय की स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब चर्चा इस बात की भी हो रही है कि क्या गठबंधन के सभी दल चुनाव के दौरान एक-दूसरे के उम्मीदवारों को समान गंभीरता से समर्थन दे रहे हैं या फिर सीटों का बंटवारा केवल कागजों तक सीमित रह गया है।

आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए यह विवाद एनडीए के लिए अहम हो सकता है। विधान परिषद चुनाव में जदयू का कमजोर प्रदर्शन, सहयोगी दलों से अपेक्षित समर्थन नहीं मिलने की शिकायत और जीतने वाले निर्दलीय नेताओं का भाजपा के करीब जाना गठबंधन की आंतरिक राजनीति को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भाजपा और जदयू नेतृत्व इस असहजता को किस तरह दूर करते हैं और आगामी चुनावों के लिए आपसी समन्वय कैसे मजबूत करते हैं।

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