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झारखंड में भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करने वाली एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) की कार्यशैली पर एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं। एजेंसी के पास 216 प्रारंभिक जांच से जुड़े मामले लंबित हैं। इनमें 43 मामलों में जांच पूरी होने के बावजूद प्राथमिकी दर्ज करने की अनुमति या आगे की कार्रवाई का इंतजार है। वहीं, 173 मामलों में प्रारंभिक जांच अब भी जारी है। इनमें पांच पूर्व मंत्रियों की कथित आय से अधिक संपत्ति की जांच समेत कई चर्चित मामले शामिल हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता पंकज यादव का दावा है कि भ्रष्टाचार से संबंधित उनके उठाए गए करीब 12 मामले भी ACB में लंबित हैं। हाल ही में झारखंड हाईकोर्ट ने जांच में देरी पर नाराजगी जताते हुए सभी लंबित मामलों का छह महीने के भीतर निष्पादन करने का निर्देश दिया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि निर्धारित अवधि में जांच पूरी नहीं होने पर देरी के कारण रिकॉर्ड में दर्ज करने होंगे।
पांच पूर्व मंत्रियों की संपत्ति जांच पर नजर
ACB के चर्चित मामलों में रघुवर दास सरकार में मंत्री रहे अमर कुमार बाउरी, रणधीर कुमार सिंह, डॉ. नीरा यादव, नीलकंठ सिंह मुंडा और लुईस मरांडी की कथित आय से अधिक संपत्ति की जांच शामिल है। सामाजिक कार्यकर्ता पंकज कुमार यादव ने 2014 और 2019 के चुनावी हलफनामों में संपत्ति में कथित बढ़ोतरी का मुद्दा उठाते हुए हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी।
25 जुलाई 2023 को राज्य मंत्रिपरिषद ने पांचों पूर्व मंत्रियों के खिलाफ प्रारंभिक जांच की अनुमति दी थी। इसके बाद जांच की प्रगति और उसके निष्कर्षों को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
RINPAS नियुक्तियों से लेकर जलापूर्ति योजना तक जांच
रांची स्थित रिनपास (RINPAS) में कथित नियुक्ति अनियमितताओं को लेकर सितंबर 2016 में ACB ने करीब 14 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी। इनमें दो पूर्व मंत्रियों, तत्कालीन स्वास्थ्य सचिव बीके त्रिपाठी और संस्थान के पूर्व निदेशक डॉ. अमूल रंजन के नाम शामिल थे। आरोप नियुक्ति के मानकों की कथित अनदेखी और वेतन वृद्धि में गड़बड़ी से जुड़े थे।
गोड्डा की महगामा ग्रामीण जलापूर्ति योजना भी जांच के दायरे में रही है। करीब 1.64 करोड़ रुपये की इस योजना में लगभग 70 लाख रुपये के अतिरिक्त भुगतान का आरोप लगा था। मामले में 12 इंजीनियरों और एक ठेकेदार के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज होने की जानकारी सामने आई थी।
विनय चौबे का मामला, चार्जशीट में देरी से मिली राहत
IAS अधिकारी विनय कुमार चौबे के खिलाफ कथित शराब घोटाले और आय से अधिक संपत्ति के मामले में नवंबर 2025 में ACB ने प्राथमिकी दर्ज की थी। जांच के दौरान संपत्ति, बैंक लेन-देन और निवेश से जुड़े पहलुओं की पड़ताल की गई। मार्च 2026 में निर्धारित समय के भीतर आरोपपत्र दाखिल नहीं होने के कारण उन्हें डिफॉल्ट बेल मिलने की खबर सामने आई थी। यह मामला जांच और कानूनी प्रक्रिया में समयबद्ध कार्रवाई की अहमियत को रेखांकित करता है।
नामकुम और RIMS जमीन मामलों में भी कार्रवाई
रांची के नामकुम अंचल के डुंडू क्षेत्र में जमीन के कथित अवैध दाखिल-खारिज और सरकारी दस्तावेज गायब होने के मामले में हाईकोर्ट के निर्देश पर ACB ने जांच शुरू की थी। आरोप है कि शिकायतकर्ता के परिवार की जमीन के एक हिस्से की जमाबंदी प्रकाश कमर्शियल प्राइवेट लिमिटेड के नाम पर खोल दी गई।
इस मामले में अगस्त 2026 में तत्कालीन अंचलाधिकारी डॉ. श्वेता वर्मा, राजस्व निरीक्षक मनोज कुमार और कार्यालय लिपिक दीपक कुमार के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई। मामले में दो से अधिक लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेजे जाने की जानकारी भी सामने आई है।
वहीं, रिम्स की अधिग्रहित जमीन पर कथित कब्जे और फर्जी दस्तावेजों के जरिए खरीद-बिक्री के मामले में जनवरी 2026 में प्राथमिकी दर्ज की गई थी। जांच के दौरान मोरहाबादी और कोकर की जमीन से जुड़े मामले सामने आए। अप्रैल में चार आरोपितों की गिरफ्तारी हुई, जबकि जून में बिल्डर शुभम साबू को गिरफ्तार किया गया। जुलाई 2026 में चार आरोपितों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया गया। जांच में सरकारी जमीन के रिकॉर्ड, रजिस्ट्री, म्यूटेशन और निर्माण अनुमति से जुड़ी कथित अनियमितताओं की पड़ताल की जा रही है।
विधानसभा में भी उठ चुकी है ACB की कार्यशैली पर बहस
ACB के कामकाज को लेकर राजनीतिक स्तर पर भी सवाल उठते रहे हैं। पूर्व मंत्री और कांग्रेस विधायक रामेश्वर उरांव ने विधानसभा में एजेंसी की कार्यशैली पर टिप्पणी करते हुए आरोप लगाया था कि कार्रवाई के मामलों में समानता नहीं बरती जा रही है। उनके बयान ने जांच एजेंसी की निष्पक्षता और जवाबदेही को लेकर बहस छेड़ दी थी।
90 दिन में प्रारंभिक जांच का प्रावधान, फिर भी वर्षों की देरी
झारखंड कैबिनेट निगरानी अधिसूचना, 2015 के क्लॉज 21(4)(viii) के तहत प्रारंभिक जांच सामान्य तौर पर 90 दिनों में पूरी करने का प्रावधान बताया गया है। जांच की अवधि बढ़ाने की स्थिति में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कारण दर्ज करना और सक्षम अधिकारी का आदेश लेना जरूरी है। लंबित मामलों की समय-समय पर समीक्षा का भी प्रावधान है।
इसके बावजूद कई मामलों में लंबे समय तक जांच पूरी नहीं होने से व्यवस्था पर सवाल उठे हैं। जांच में देरी के कारणों, समय-सीमा बढ़ाने के आदेशों और जांच पूरी होने के बाद सरकारी अनुमति के लिए फाइलों के लंबित रहने की अवधि की पड़ताल जरूरी हो गई है।
हाईकोर्ट की सख्ती, छह महीने में जांच पूरी करने का निर्देश
हाईकोर्ट ने कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित न्याय का अधिकार जांच की प्रक्रिया से भी जुड़ा है। किसी व्यक्ति के खिलाफ लंबे समय तक जांच लंबित रहने से उसके करियर, पदोन्नति, पेंशन और सामाजिक प्रतिष्ठा पर असर पड़ सकता है। वहीं, भ्रष्टाचार के मामलों में देरी से साक्ष्य प्रभावित होने और जांच कमजोर पड़ने का जोखिम रहता है।
अदालत ने मुख्य सचिव, गृह सचिव और ACB के महानिदेशक को आदेश की प्रति उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। साथ ही लंबित प्रारंभिक जांचों को छह महीने के भीतर पूरा करने की समय-सीमा तय की है। जिन मामलों में जांच पूरी हो चुकी है, लेकिन प्राथमिकी या आगे की कार्रवाई के लिए सरकारी अनुमति लंबित है, उनमें संबंधित सक्षम प्राधिकारियों को भी समय पर निर्णय लेना होगा।
अब निगाहें इस बात पर हैं कि ACB और संबंधित विभाग अदालत की तय समय-सीमा के भीतर कितने मामलों में जांच पूरी कर पाते हैं और कितनी लंबित फाइलों पर आगे की कार्रवाई शुरू होती है।





