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जशपुर में दशहरे पर आस्था के दो रूप, राजमहल में उत्सव तो आदिवासी गांवों में शोक

by उर्वशी शेखर
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छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में दशहरे के मौके पर परंपरा और आस्था के दो अलग-अलग रूप देखने को मिले। एक ओर जशपुर राजपरिवार ने अपनी 27 पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा के तहत राजमहल में शस्त्र पूजा की और 55 फीट ऊंचे रावण का दहन किया। दूसरी ओर, जिले के कुछ आदिवासी गांवों में इस अवसर को उत्सव के बजाय शोक के रूप में मनाया गया।

राजमहल में दशहरे का आयोजन पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ हुआ। ढोल-नगाड़ों की आवाज के बीच शस्त्रों की पूजा की गई। शाम को 55 फीट ऊंचे रावण के पुतले का दहन किया गया। इस आयोजन को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचे और राजपरिवार की ऐतिहासिक परंपरा के साक्षी बने।

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इसके उलट, जिले के कुछ आदिवासी गांवों में दशहरे के दौरान महिषासुर को याद किया गया। खुद को महिषासुर का वंशज मानने वाले समुदाय के लोगों ने उनकी शहादत पर शोक जताया और अपने पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन किया। इन गांवों में दशहरे का स्वरूप प्रचलित उत्सवी परंपरा से अलग रहा।

जशपुर में एक ही दिन सामने आईं ये दोनों तस्वीरें स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बनी हुई हैं। एक तरफ राजपरिवार की पीढ़ियों पुरानी परंपरा के तहत शस्त्र पूजा और रावण दहन हुआ, तो दूसरी तरफ कुछ आदिवासी समुदायों ने अपनी सांस्कृतिक मान्यताओं के अनुरूप महिषासुर की स्मृति में शोक मनाया। यह अंतर जिले की विविध सांस्कृतिक परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं को सामने लाता है।

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