Tuesday, October 6, 2026
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गांधी-लोहिया की साझा विरासत और आज की राजनीति में उसकी प्रासंगिकता पर फिर चर्चा जरूरी

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महात्मा गांधी और समाजवादी चिंतक डॉ. राम मनोहर लोहिया के वैचारिक संबंधों तथा उनके राजनीतिक-सामाजिक विचारों की आज के संदर्भ में प्रासंगिकता पर नए सिरे से विमर्श की जरूरत है। लखनऊ के लोहियावादी चिंतक दीपक मिश्रा का कहना है कि दोनों नेताओं ने भारतीय जनमानस पर गहरा प्रभाव छोड़ा और उनके विचारों में सत्य, अहिंसा, सामाजिक समानता, विकेंद्रीकरण तथा आम आदमी के हित जैसे कई साझा सूत्र दिखाई देते हैं।

मिश्रा के मुताबिक, गांधी और लोहिया उन चुनिंदा भारतीय नेताओं में थे जिन्होंने देश की सीमाओं से बाहर भी अन्याय के खिलाफ सत्याग्रह का रास्ता अपनाया। गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में नस्लीय भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष किया, जबकि लोहिया ने अमेरिका में रंगभेद के खिलाफ सत्याग्रह किया था।

आजादी के दौर में सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ साथ

मिश्रा के अनुसार, 1947 में जब देश के शीर्ष नेता दिल्ली में सत्ता हस्तांतरण और नई सरकार की व्यवस्था में जुटे थे, गांधी बंगाल में सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के प्रयास में लगे थे। उस समय लोहिया भी उनके साथ रहे और लोगों को संगठित करने में भूमिका निभाई।

भारत छोड़ो आंदोलन के दौर में भी लोहिया ने भूमिगत रहकर आंदोलन को आगे बढ़ाने का काम किया। उनके सहयोगियों में जगमोहन बोस समेत कई कार्यकर्ता शामिल थे। सांप्रदायिक ताकतों के विरोध के कारण उन्हें धमकियां मिलीं और उनके सिर पर इनाम तक घोषित किया गया। कई हमलों के बावजूद उन्होंने अपना अभियान जारी रखा।

मिश्रा बताते हैं कि गांधी की पहल पर 14 अगस्त 1947 को लोहिया ने कोलकाता के श्रद्धानंद पार्क में सभा की और हिंदू-मुस्लिम एकता के संदेश के साथ जुलूस निकाला। उनका मानना था कि ऐसे प्रयासों ने सांप्रदायिक ताकतों के सामने एक वैकल्पिक सामाजिक संदेश खड़ा किया।

गोवा आंदोलन को गांधी का समर्थन

गोवा की आजादी के आंदोलन में भी लोहिया की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए मिश्रा ने 18 जून 1946 को शुरू किए गए उनके अभियान का उल्लेख किया। पणजी में गिरफ्तारी के बाद आंदोलन का प्रभाव गोवा के अन्य हिस्सों तक पहुंचा। महात्मा गांधी ने 26 जून 1946 के ‘हरिजन’ में लेख के माध्यम से लोहिया के गोवा आंदोलन का समर्थन किया था।

मिश्रा के अनुसार, गांधी और लोहिया दोनों ने निजी जीवन में सादगी और त्याग को महत्व दिया। कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर भी उनके विचारों में कई समानताएं थीं। इसी संदर्भ में वह बताते हैं कि गांधी के आग्रह पर लोहिया को अन्न समिति में शामिल किया गया था। हालांकि, बाद में घनश्याम दास बिड़ला के साथ मतभेद के बाद लोहिया ने समिति से इस्तीफा दे दिया।

सत्ता से दूरी, विचारों से प्रतिबद्धता

मिश्रा के मुताबिक, गांधी और लोहिया दोनों ने राजनीतिक प्रभाव के बावजूद सरकारी पदों को प्राथमिकता नहीं दी। उनके अनुसार, जवाहरलाल नेहरू लोहिया को राष्ट्रीय सरकार में विदेश मंत्रालय की जिम्मेदारी देना चाहते थे। लोहिया ने 1936 में कांग्रेस के भीतर विदेश विभाग की स्थापना में भूमिका निभाई थी और बाद में नेहरू के आग्रह पर उससे जुड़े दायित्व भी संभाले।

लोहिया के समाजवाद को मिश्रा यूरोपीय मॉडल की नकल के बजाय भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों से विकसित विचारधारा के रूप में देखते हैं। भारतीय परंपरा, राम, कृष्ण और शिव जैसे सांस्कृतिक प्रतीकों तथा रामायण मेले के आयोजन से जुड़े उनके विचार इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा थे।

गांधी के ‘राम राज्य’ के विचार को लोहिया ने अपनी व्याख्या में अधिक समावेशी स्वरूप देने की कोशिश की और ‘सीताराम राज्य’ की अवधारणा सामने रखी। महिला-पुरुष समानता को लेकर भी दोनों नेताओं के विचारों में समानता थी।

गांधी के समाजवाद और लोहिया की व्याख्या

मिश्रा का तर्क है कि लोहिया के समाजवादी चिंतन पर पर्याप्त चर्चा होती है, लेकिन गांधी के समाजवादी विचारों को अपेक्षाकृत कम समझा जाता है। गांधी साहित्य के अध्ययन का हवाला देते हुए वह गांधी को भारतीय समाजवादी चिंतन की महत्वपूर्ण कड़ी मानते हैं।

उनके अनुसार, गांधी ने 1937 में लिखे एक लेख में समाजवाद की जड़ों को भारतीय परंपरा से जोड़ते हुए ‘सबै भूमि गोपाल की’ जैसी धारणा का उल्लेख किया था। गांधी समाजवाद को व्यापक लोककल्याण से जोड़ते थे और उसके साथ सत्य तथा अहिंसा को अनिवार्य मानते थे।

1947 में ‘हरिजन’ में प्रकाशित अपने लेख में गांधी ने ऐसे समाजवाद की बात की थी जिसका उद्देश्य समाज के अंतिम व्यक्ति के हित तक पहुंचना था। गांधी के लिए साध्य के साथ साधनों की शुचिता भी महत्वपूर्ण थी।

मिश्रा के मुताबिक, लोहिया ने गांधी के इन विचारों को केवल सैद्धांतिक समर्थन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें राजनीतिक कार्यक्रमों और सामाजिक आंदोलनों का आधार बनाया। वह स्वयं को ‘कुजात गांधीवादी’ कहते थे। उनके विचारों में ‘विशेष अवसर’, कीमतों पर नियंत्रण, हिमालय संरक्षण, विकेंद्रीकरण और ‘सप्त क्रांति’ जैसी अवधारणाएं शामिल थीं।

भाषा, पत्रकारिता और सामाजिक बदलाव

गांधी भारतीय भाषाओं और हिंदी के व्यापक इस्तेमाल के समर्थक थे। उन्होंने अंग्रेजी के प्रभुत्व के मुकाबले भारतीय भाषाओं को जनसंचार और सार्वजनिक जीवन में अधिक स्थान देने की वकालत की। लोहिया ने भी भाषा के सवाल को सामाजिक समानता से जोड़ते हुए लोकभाषाओं और आम जनता की भाषा के पक्ष में विचार रखे।

पत्रकारिता के क्षेत्र में भी दोनों नेताओं ने अपनी छाप छोड़ी। गांधी ने ‘यंग इंडिया’ और ‘हरिजन’ जैसे प्रकाशनों के जरिए सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर जनमत तैयार किया। लोहिया ने भी ‘मैनकाइंड’ और ‘जन’ जैसे प्रकाशनों के माध्यम से अपने विचारों को व्यापक समाज तक पहुंचाया।

साझा विरासत को समझने की जरूरत

दीपक मिश्रा का मानना है कि गांधी और लोहिया के नाम आज भी सार्वजनिक जीवन में व्यापक रूप से लिए जाते हैं, लेकिन उनके विचारों को व्यवहार में उतारने की आवश्यकता है। उनका तर्क है कि आर्थिक असमानता, सामाजिक विषमता और विकास से जुड़े सवालों को समझने में दोनों नेताओं के विचार आज भी उपयोगी हो सकते हैं।

मिश्रा ने देश की आर्थिक स्थिति और वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति को लेकर भी चिंता जताई है। उन्होंने गांधी-लोहिया की विरासत को केवल राजनीतिक स्मृति तक सीमित रखने के बजाय उनके विचारों पर गंभीर बहस और अमल की जरूरत बताई।

उनके अनुसार, गांधी और लोहिया की साझा वैचारिक विरासत भारतीय लोकतांत्रिक और सामाजिक चिंतन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसे समझना और वर्तमान परिस्थितियों के संदर्भ में इसकी उपयोगिता पर विचार करना आज भी जरूरी है।

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