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झारखंड के हजारीबाग में अधिवक्ता प्रशांत सहाय की हत्या को करीब दो दशक से अधिक समय गुजर चुका है, लेकिन इस मामले से जुड़े कई सवाल आज भी चर्चा में हैं। 5 सितंबर 2004 को दिन के उजाले में हुई इस हत्या ने न केवल हजारीबाग बल्कि पूरे राज्य में सनसनी फैला दी थी। जांच आगे बढ़ी तो पुलिस ने हत्या के पीछे कथित साजिश, सुपारी और आपराधिक नेटवर्क की कहानी सामने रखी। कई लोगों के नाम भी जांच के दायरे में आए। हालांकि, बाद में एक अहम गवाह के बयान में आए बदलाव और CBI की जांच ने पुलिस की शुरुआती जांच पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
नर्सिंग होम के बाहर हुई थी वारदात
5 सितंबर 2004 की दोपहर प्रशांत सहाय अपनी कार से एक निजी नर्सिंग होम पहुंचे थे। उनके साथ एक महिला डॉक्टर भी मौजूद थीं। बताया गया कि जैसे ही वह नर्सिंग होम के सामने पहुंचे, बाइक से आए हमलावरों ने उन पर ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी। हमले के बाद आरोपी मौके से भाग निकले।
तत्कालीन पुलिस जांच में घटनास्थल से कई राउंड फायरिंग के संकेत मिलने की बात कही गई थी। गोलीबारी की इस घटना ने पुलिस के सामने हत्या के पीछे की वजह और हमलावरों की पहचान का बड़ा सवाल खड़ा कर दिया।
प्रशांत सहाय की पहचान एक ऐसे अधिवक्ता के तौर पर थी, जो प्रभावशाली लोगों से जुड़े मामलों की पैरवी करते थे। भ्रष्टाचार और आपराधिक गतिविधियों से संबंधित मामलों को लेकर भी उनका नाम सामने आता रहा था। ऐसे में हत्या की जांच में पुलिस को व्यक्तिगत रंजिश से लेकर संगठित अपराध तक कई संभावित पहलुओं पर काम करना पड़ा।
पुलिस ने सुपारी किलिंग की थ्योरी रखी
हत्या के बाद शुरुआती जांच में पुलिस ने व्यक्तिगत दुश्मनी समेत कई संभावनाओं को खंगाला। कुछ समय बाद पुलिस अधिकारियों ने दावा किया कि प्रशांत सहाय की हत्या के लिए कथित तौर पर सुपारी दी गई थी। जांच के दौरान जेल में पदस्थ पुलिसकर्मी श्रीनिवास शर्मा का नाम सामने आया। पुलिस का दावा था कि पूछताछ के दौरान शर्मा ने उपेंद्र राय का नाम लिया था। जांच एजेंसियों की तत्कालीन कहानी में उपेंद्र राय को कथित साजिश से जोड़ते हुए कहा गया कि शूटरों तक पहुंच बनाने के लिए आपराधिक नेटवर्क का इस्तेमाल किया गया।

पुलिस ने यह भी दावा किया था कि मुकेश और तिवारी नाम के लोगों ने कथित तौर पर वारदात को अंजाम दिया। जांच की उस थ्योरी के मुताबिक, वारदात के बाद हमलावर अपनी मोटरसाइकिल छोड़कर एक बोलेरो वाहन से वहां से निकल गए थे। हालांकि, पुलिस की यह कहानी आगे चलकर जांच का अंतिम निष्कर्ष साबित नहीं हो सकी।
प्रत्यक्षदर्शी के बयान ने बदल दी जांच की दिशा
मामले का सबसे अहम पहलू उस महिला चिकित्सक का बयान था, जिन्हें घटना का प्रमुख प्रत्यक्षदर्शी माना गया था। पुलिस की शुरुआती जांच में दावा किया गया कि उन्होंने एक संदिग्ध की पहचान की थी। लेकिन बाद में चिकित्सक ने पुलिस की इस कार्रवाई पर ही सवाल खड़े कर दिए। उनका आरोप था कि पुलिस ने उन्हें तस्वीर दिखाकर एक व्यक्ति को हत्यारों में शामिल बताने के लिए दबाव बनाया था।
इस आरोप के बाद आरोपी की पहचान से जुड़ी पुलिस कार्रवाई की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे। जांच के बीच यह मुद्दा महत्वपूर्ण बन गया कि प्रत्यक्षदर्शी की पहचान वास्तव में स्वतंत्र थी या उसे किसी दिशा में ले जाने का प्रयास किया गया था।

मामले की पुलिस जांच को लेकर अधिवक्ताओं और विभिन्न संगठनों की ओर से सवाल उठाए गए। निष्पक्ष जांच की मांग तेज हुई और मामला अंततः CBI की जांच के दायरे में पहुंचा।
2005 में CBI ने घटना की प्रमुख प्रत्यक्षदर्शी महिला चिकित्सक से पूछताछ की। जांच के दौरान उन्हें पांच लोगों की तस्वीरें दिखाई गईं। उपलब्ध जांच विवरण के अनुसार, चिकित्सक इनमें से किसी भी व्यक्ति को हमले में शामिल हत्यारे के तौर पर पहचान नहीं सकीं। इस घटनाक्रम ने पुलिस द्वारा पहले किए गए पहचान संबंधी दावों को और अधिक सवालों के घेरे में ला दिया।
पुलिस ने खुलासे का दावा किया, लेकिन सवाल खत्म नहीं हुए
अक्टूबर 2004 में पुलिस ने हत्याकांड का खुलासा करने का दावा किया था। जांच के दौरान उपेंद्र राय को कथित मुख्य साजिशकर्ता और कुछ अन्य लोगों को कथित हमलावर बताया गया। लेकिन प्रत्यक्षदर्शी की पहचान को लेकर सामने आए विरोधाभासों ने इस दावे की मजबूती पर प्रश्नचिह्न लगा दिया।
बाद की CBI जांच में भी प्रत्यक्षदर्शी द्वारा तस्वीरों के आधार पर किसी आरोपी की पहचान नहीं कर पाना मामले को और पेचीदा बनाता है।
चार साल पहले हुआ हमला भी जांच में महत्वपूर्ण कड़ी
प्रशांत सहाय पर हत्या से पहले भी हमला हो चुका था। वर्ष 2000 में उनके घर के बाहर उनकी कार पर बम फेंके जाने की घटना सामने आई थी। उस हमले में भी पुलिस आरोपियों तक नहीं पहुंच सकी थी।
हत्या के बाद वर्ष 2000 की इस घटना को भी जांच के संभावित आधार के रूप में देखा गया। जांचकर्ताओं के सामने यह सवाल था कि क्या दोनों घटनाओं के बीच कोई संबंध था या हत्या के पीछे कोई अलग वजह काम कर रही थी।
आज भी कायम है सबसे बड़ा सवाल
प्रशांत सहाय हत्याकांड की जांच में समय-समय पर कई नाम सामने आए। श्रीनिवास शर्मा, उपेंद्र राय तथा कथित शूटरों के नाम पुलिस की जांच से जुड़े रहे। लेकिन आरोपों, प्रत्यक्षदर्शी की पहचान और साजिश की कड़ियों को लेकर उठे सवालों ने इस मामले को सामान्य आपराधिक वारदात से कहीं अधिक जटिल बना दिया।
सबसे बड़ा सवाल आज भी यही है कि आखिर प्रशांत सहाय की हत्या की वास्तविक वजह क्या थी और गोली चलाने वालों तक पहुंचने में जांच कहां कमजोर पड़ी?
दो दशक से ज्यादा समय बाद भी यह हत्याकांड हजारीबाग की उन चर्चित घटनाओं में शामिल है, जिसने अपराध, प्रभावशाली नेटवर्क, पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया; इन सभी पर गंभीर बहस को जन्म दिया। पुलिस के दावों और बाद की जांच में सामने आए विरोधाभासों के कारण यह मामला आज भी कई अनुत्तरित सवाल अपने साथ लिए हुए है।