Wednesday, October 7, 2026
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ब्लड बैंक से बायोमेडिकल वेस्ट तक! झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था पर हाईकोर्ट की निगरानी

by उर्वशी शेखर
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झारखंड में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति से जुड़े कई महत्वपूर्ण मामले इस समय झारखंड हाईकोर्ट के समक्ष हैं। अलग-अलग जनहित याचिकाओं और आपराधिक मामलों के माध्यम से अस्पतालों की सुविधाओं, रक्त उपलब्धता, आपात चिकित्सा, एंबुलेंस सेवा और जैव चिकित्सा कचरे के प्रबंधन से जुड़े सवाल अदालत तक पहुंचे हैं। इन मामलों में कोर्ट ने संबंधित विभागों और संस्थानों से स्थिति रिपोर्ट, जांच की प्रगति और आदेशों के अनुपालन की जानकारी मांगी है।

रिम्स की जमीन और सुविधाओं पर निगरानी

रिम्स की व्यवस्थाओं को लेकर W.P. (PIL) No. 4736 of 2018, ज्योति शर्मा बनाम झारखंड सरकार मामले में सुनवाई चल रही है। इसमें अस्पताल की आधारभूत सुविधाओं के अलावा कर्मचारियों, चिकित्सा उपकरणों, जांच सेवाओं तथा परिसर और जमीन से जुड़े मुद्दे शामिल हैं।

नवंबर 2025 में अदालत ने रिम्स परिसर की जमीन और वहां मौजूद अतिक्रमण से संबंधित रिकॉर्ड मांगा था। इसके बाद 26 और 27 नवंबर को झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के सदस्य सचिव ने संस्थान का निरीक्षण किया। रिपोर्ट में विभिन्न मौजा की जमीन और अतिक्रमण की स्थिति का उल्लेख किया गया।

अदालत ने रिम्स की जांच सुविधाओं की भी जानकारी ली। अस्पताल प्रशासन ने पैथोलॉजी, माइक्रोबायोलॉजी और बायोकेमिस्ट्री समेत उपलब्ध जांच सेवाओं का विवरण दिया। साथ ही एमआरआई, मैमोग्राफी, पोर्टेबल सीटी स्कैन और पेट स्कैन जैसे उपकरणों की खरीद प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी भी प्रस्तुत की गई।

रक्त की उपलब्धता पर कई याचिकाएं

झारखंड में ब्लड बैंक और रक्त उपलब्धता का मुद्दा भी हाईकोर्ट में कई मामलों का हिस्सा है। W.P. (PIL) No. 6062 of 2025, 2971 of 2020, 2413 of 2021 और 4688 of 2025 में राष्ट्रीय रक्त नीति के अनुरूप स्वैच्छिक रक्तदान और जरूरतमंद मरीजों को समय पर रक्त उपलब्ध कराने की व्यवस्था पर सवाल उठे।

सुनवाई के दौरान यह समस्या भी सामने आई कि कुछ परिस्थितियों में मरीज के परिजनों को स्वयं रक्तदाता की व्यवस्था करनी पड़ती है। दिसंबर 2025 के आदेश में अदालत ने स्वैच्छिक रक्तदान को बढ़ाने, प्रत्येक जिले में रक्त के विभिन्न घटकों को तैयार करने की सुविधा विकसित करने, शिकायतों के लिए अलग तंत्र बनाने और ब्लड स्टोरेज केंद्रों के नियमित निरीक्षण सहित कई पहलुओं पर निर्देश दिए।

रक्त की उपलब्धता से संबंधित जानकारी आम लोगों तक पहुंचाने के लिए मोबाइल एप, वेबसाइट और टोल-फ्री नंबर जैसी व्यवस्थाओं पर भी निर्देश दिए गए थे। इन निर्देशों के अनुपालन के लिए 20 मार्च 2026 की समयसीमा निर्धारित की गई थी।

चाईबासा में थैलेसीमिया मरीजों को कथित संक्रमित रक्त का मामला

चाईबासा में पांच नाबालिग थैलेसीमिया मरीजों को कथित तौर पर एचआईवी संक्रमित रक्त चढ़ाए जाने का मामला भी हाईकोर्ट पहुंचा। W.P. (Cr.) No. 50 of 2026 में परिजनों ने प्राथमिकी दर्ज कर मामले की जांच कराने की मांग की थी।

4 फरवरी 2026 को अदालत ने प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया, जिसके बाद पुलिस ने केस दर्ज किया। अप्रैल 2026 में हाईकोर्ट ने जांच की प्रगति पर रिपोर्ट मांगी। मामले में रक्त की जांच, ट्रांसफ्यूजन की प्रक्रिया और कथित संक्रमण से संबंधित तथ्यों की जांच प्रमुख बिंदु बने हुए हैं।

बर्न मरीजों के इलाज की सुविधाओं पर भी सवाल

जलने से गंभीर रूप से घायल मरीजों के उपचार की व्यवस्था से संबंधित W.P. (PIL) No. 920 of 2021, ओंकार विश्वकर्मा बनाम झारखंड सरकार मामले में भी सुनवाई हुई। इसकी शुरुआत हजारीबाग में मिट्टी तेल से हुई आग की घटना और उसके बाद इलाज की व्यवस्था से जुड़े सवालों से हुई थी।

बाद में सुनवाई का दायरा बढ़ा और राज्यभर में बर्न मरीजों के लिए उपचार सुविधाओं, अलग बर्न यूनिट, प्रशिक्षित चिकित्सकों व कर्मचारियों, दवाओं तथा आवश्यक चिकित्सा उपकरणों की उपलब्धता जैसे विषय इसमें शामिल हुए। 1 अप्रैल 2026 के फैसले में हाईकोर्ट ने जलने वाले मरीजों के लिए राज्य में व्यवस्थित चिकित्सा सुविधाओं से जुड़े निर्देश जारी किए।

108 एंबुलेंस सेवा भी अदालत के रडार पर

आपातकालीन चिकित्सा सेवा के लिए महत्वपूर्ण 108 एंबुलेंस व्यवस्था से जुड़े मामले में भी हाईकोर्ट ने सरकार से जानकारी ली। अगस्त 2025 में राज्य सरकार ने अदालत को बताया था कि प्रदेश में कुल 510 एंबुलेंस उपलब्ध हैं। इनमें लगभग 430 परिचालन में थीं, जबकि 57 वाहनों को मरम्मत की जरूरत थी। सरकार ने 30 नई एडवांस लाइफ सपोर्ट एंबुलेंस उपलब्ध कराने की योजना की भी जानकारी दी थी।

सुनवाई में चालकों से जुड़े मुद्दों के अलावा सेवा बाधित होने और गंभीर मरीजों को कम से कम समय में अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था पर भी सवाल उठे।

रांची सदर अस्पताल से संबंधित स्वत: संज्ञान मामले में एक गर्भवती महिला को ट्रैफिक जाम और सड़क पर वाहनों के गलत तरीके से खड़े होने के कारण अस्पताल पहुंचने में परेशानी हुई थी। इसके बाद हाईकोर्ट ने यातायात पुलिस अधीक्षक और रांची सिविल सर्जन को गंभीर मरीजों तथा एंबुलेंस के लिए आवागमन सुचारु रखने के निर्देश दिए।

अस्पतालों के जैव चिकित्सा कचरे पर भी कोर्ट की नजर

स्वास्थ्य व्यवस्था का एक अन्य अहम पक्ष अस्पतालों से निकलने वाले जैव चिकित्सा कचरे का निपटारा है। W.P. (PIL) No. 1385 of 2012, झारखंड ह्यूमन राइट्स कॉन्फ्रेंस बनाम झारखंड सरकार एवं अन्य में अस्पतालों से निकलने वाले बायोमेडिकल वेस्ट के संग्रहण, परिवहन, उपचार और अंतिम निपटान की व्यवस्था पर सुनवाई हो रही है।

26 फरवरी 2026 के आदेश में अदालत ने निगरानी व्यवस्था मजबूत करने, जिलावार आंकड़े तैयार करने, नियमित निरीक्षण और संबंधित नियमों के अनुपालन से जुड़े निर्देश दिए।

इस तरह राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था का कोई एक पहलू नहीं, बल्कि रिम्स की आधारभूत सुविधाओं से लेकर रक्त आपूर्ति, कथित संक्रमित रक्त, बर्न उपचार, आपातकालीन एंबुलेंस और मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट तक कई विषय हाईकोर्ट की निगरानी में हैं। अलग-अलग मामलों में अदालत संबंधित विभागों और संस्थानों से रिपोर्ट तथा आदेशों के अनुपालन की स्थिति लगातार मांग रही है।

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