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आदिवासी समाज की धार्मिक आस्था, पारंपरिक व्यवस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक ऐतिहासिक मुड़मा जतरा मंगलवार को शुरू हो गया। शक्ति खूंटा स्थल पर सरना रीति-रिवाज से पूजा-अर्चना के साथ दो दिवसीय आयोजन का आगाज हुआ। मांदर-नगाड़ों की गूंज और पारंपरिक वेशभूषा के बीच जतरा में आदिवासी समाज की समृद्ध परंपराओं की झलक देखने को मिली।
शाम करीब चार बजे सरना धर्मगुरु बंधन तिग्गा के नेतृत्व में 40 पड़हा के महतो, पाहन, पुजार, पनभरा और कोटवार समेत अन्य पारंपरिक अगुवा शक्ति खूंटा पहुंचे। विधिवत पूजा के बाद मुख्य मंच पर कलश के सामने दीप प्रज्वलित कर जतरा की शुरुआत की गई। इस दौरान बंधन तिग्गा ने आयोजन की ऐतिहासिक और धार्मिक महत्ता बताते हुए परंपराओं को आगे बढ़ाने का आह्वान किया। कार्यक्रम का संचालन रवि तिग्गा ने किया।
आदिवासी समाज की पारंपरिक न्याय व्यवस्था का प्रतीक है शक्ति खूंटा
मुड़मा का शक्ति खूंटा आदिवासी समाज में धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक एकता का भी प्रतीक माना जाता है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, रोहतासगढ़ से छोटानागपुर आने के बाद यहां उरांव और मुंडा समुदायों के बीच समझौता हुआ था। इसी ऐतिहासिक प्रसंग के कारण इस स्थल का विशेष महत्व है।
परंपरागत व्यवस्था में सात और 21 पड़हा के स्तर पर विवाद नहीं सुलझने पर 40 पड़हा के प्रतिनिधि एकत्र होकर सामूहिक विचार-विमर्श करते हैं। इसके बाद विवाद के समाधान पर निर्णय लिया जाता है। इस लिहाज से मुड़मा जतरा केवल धार्मिक मेला नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया और पारंपरिक न्याय व्यवस्था की पहचान भी है।
पांच लाख लोगों के आने की संभावना, 25 करोड़ तक कारोबार का अनुमान
मुड़मा जतरा धार्मिक आयोजन के साथ बड़े व्यापारिक मेले का रूप भी ले चुका है। आयोजकों के मुताबिक, हर साल यहां करीब तीन हजार छोटी-बड़ी दुकानें लगती हैं। इस बार दो दिनों में पांच लाख से अधिक लोगों के पहुंचने की संभावना है। मेले में लगभग 20 से 25 करोड़ रुपये के कारोबार का अनुमान लगाया गया है।
समय के साथ मेले का स्वरूप बदला है, लेकिन इसकी पारंपरिक पहचान कायम है। कभी ढिबरी की रोशनी में सजने वाली दुकानें अब आधुनिक सुविधाओं के बीच नजर आती हैं। इसके बावजूद धार्मिक अनुष्ठानों और सांस्कृतिक परंपराओं का महत्व बरकरार है।
दूसरे दिन विभिन्न पड़हा के लोगों का होगा जुटान
बुधवार को जतरा के दूसरे दिन विभिन्न पड़हा के लोग पारंपरिक प्रतीकों और वाद्य यंत्रों के साथ आयोजन स्थल पहुंचेंगे। 40 पड़हा के प्रतिनिधियों का जुटान इस आयोजन के धार्मिक और सामाजिक महत्व को और खास बनाएगा।
भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा और यातायात प्रबंधन के इंतजाम किए हैं। मुड़मा जतरा एक बार फिर आदिवासी समाज की आस्था, सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक एकजुटता को प्रदर्शित कर रहा है।






