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खुद सचिव, खुद CMD, खुद MD! झारखंड की नौकरशाही में ‘एक अफसर, कई कुर्सियां’ का खेल

by उर्वशी शेखर
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झारखंड की प्रशासनिक व्यवस्था में अधिकारियों के बीच जिम्मेदारियों के बंटवारे को लेकर हाल के दिनों में चर्चा हुई है। राज्य के कुछ वरिष्ठ आईएएस अधिकारी एक साथ कई महत्वपूर्ण पदों का दायित्व संभाल रहे हैं। इससे सरकारी कामकाज में निर्णय लेने की प्रक्रिया, जवाबदेही और संस्थागत निगरानी की व्यवस्था पर सवाल उठाए जा रहे हैं। कुछ मामलों में प्रस्ताव तैयार करने, उसकी समीक्षा और अंतिम मंजूरी की प्रक्रिया एक ही अधिकारी से जुड़े अलग-अलग पदों के माध्यम से संचालित होती दिखाई दे सकती है। हालांकि, इसकी वास्तविक स्थिति संबंधित नियमों, आदेशों और प्रत्येक प्रकरण की प्रक्रिया की जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।

प्रशासनिक दृष्टि से यह व्यवस्था अधिकारियों की उपलब्धता, रिक्त पदों और कामकाज के संचालन से जुड़ी हो सकती है। सरकार या संबंधित विभाग की ओर से इसे प्रशासनिक समन्वय और निरंतरता बनाए रखने की आवश्यकता के रूप में देखा जा सकता है। दूसरी ओर, इससे अधिकारों के संतुलन और निर्णय प्रक्रिया में स्वतंत्र समीक्षा को लेकर भी प्रश्न उठ सकते हैं। ऊर्जा और खनन विभाग में पदों का मौजूदा वितरण इस विषय को समझने का एक उदाहरण है।

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ऊर्जा विभाग में तीन अहम पदों की जिम्मेदारी श्रीनिवासन के पास

ऊर्जा विभाग में आईएएस अधिकारी के. श्रीनिवासन के पास एक साथ तीन महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां होने की जानकारी है। वह ऊर्जा विभाग के सचिव के अलावा झारखंड ऊर्जा विकास निगम के अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक (सीएमडी) और बिजली वितरण निगम के प्रबंध निदेशक (एमडी) का कार्यभार भी संभाल रहे हैं। इन नियुक्तियों की पुष्टि संबंधित सरकारी आदेशों या विभागीय अभिलेखों से की जानी चाहिए।

इन पदों की जिम्मेदारियां अलग-अलग हैं, लेकिन एक ही अधिकारी के पास इनके होने से निर्णय प्रक्रिया में भूमिकाओं का आपस में जुड़ना संभव है। उदाहरण के लिए, बिजली वितरण निगम से संबंधित किसी मामले में प्रबंध निदेशक के स्तर पर कार्रवाई होने के बाद यदि उसे ऊर्जा विकास निगम या विभागीय सचिव के स्तर पर विचार और स्वीकृति की आवश्यकता हो, तो यह देखना जरूरी होगा कि संबंधित नियमों के तहत ऐसी प्रक्रिया कैसे निर्धारित है और क्या किसी अन्य सक्षम प्राधिकारी या समिति की भूमिका भी इसमें शामिल है।

इस व्यवस्था में विभागीय नीतियों से जुड़े मामलों पर सचिव के रूप में निर्णय लेने की जिम्मेदारी भी उन्हीं के पास हो सकती है। वहीं, निगमों के प्रशासनिक और संचालन संबंधी मामलों में एमडी तथा सीएमडी की भूमिका भी उनके पास है। ऐसे में किसी प्रकरण की जांच, समीक्षा और आगे की कार्रवाई के दौरान अलग-अलग संस्थागत पदों की भूमिकाओं के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना महत्वपूर्ण हो जाता है। संबंधित विभाग का पक्ष यह हो सकता है कि प्रत्येक पद पर निर्णय निर्धारित नियमों, प्रत्यायोजित शक्तियों और आवश्यक अनुमोदन के अनुसार लिए जाते हैं।

किसी अधिकारी के पास कई पद होने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि हर मामले में जांच और अंतिम निर्णय का अधिकार भी उसी के पास है। इसके लिए संबंधित नियमों, सरकारी आदेशों, प्रत्यायोजित शक्तियों और प्रत्येक प्रकरण की वास्तविक प्रक्रिया को देखना आवश्यक होगा। यदि इस व्यवस्था पर कोई आपत्ति या समीक्षा लंबित है, तो संबंधित अधिकारियों या विभाग का आधिकारिक पक्ष भी शामिल किया जाना चाहिए।

खनन विभाग में भी कई भूमिकाएं एक अधिकारी के पास

खनन विभाग में भी इसी तरह की प्रशासनिक व्यवस्था होने की जानकारी है। आईएएस अधिकारी अरवा राजकमल झारखंड सरकार के खान सचिव के साथ-साथ झारखंड राज्य खनिज विकास निगम के अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। इन पदों से संबंधित नियुक्ति आदेशों और वर्तमान स्थिति की पुष्टि आधिकारिक स्रोतों से की जानी चाहिए।

खान विभाग और खनिज विकास निगम के कार्य एक-दूसरे से जुड़े होने के कारण दोनों पदों पर एक ही अधिकारी की नियुक्ति प्रशासनिक समन्वय को प्रभावित कर सकती है। विभागीय स्तर पर तैयार होने वाले प्रस्तावों, सिफारिशों और निगम से संबंधित निर्णयों के बीच तालमेल बनाए रखने में यह व्यवस्था उपयोगी हो सकती है। सरकार की ओर से इसे समन्वय और कार्यों की निरंतरता के लिए आवश्यक बताया जा सकता है। दूसरी ओर, जहां किसी विषय पर अलग-अलग स्तरों पर स्वतंत्र समीक्षा अपेक्षित हो, वहां भूमिकाओं का स्पष्ट निर्धारण और निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता भी जरूरी है।

यदि किसी मामले में विभागीय सचिव और निगम के अध्यक्ष की जिम्मेदारियां एक ही अधिकारी निभा रहे हों, तो यह देखना महत्वपूर्ण हो जाता है कि संबंधित प्रस्ताव किस स्तर पर तैयार हुआ, उसका परीक्षण किस प्राधिकारी ने किया और अंतिम स्वीकृति किस नियम या आदेश के तहत दी गई। इस संबंध में विभाग, निगम या संबंधित अधिकारियों से प्राप्त आधिकारिक स्पष्टीकरण को भी रिपोर्ट में शामिल किया जाना चाहिए।

प्रशासनिक सुविधा बनाम जवाबदेही की कसौटी

एक अधिकारी को कई विभागीय या निगम संबंधी जिम्मेदारियां सौंपने के पीछे प्रशासनिक जरूरतें हो सकती हैं। इससे रिक्त पदों की स्थिति में कामकाज जारी रखने, फैसलों में देरी कम करने और विभिन्न संस्थाओं के बीच समन्वय स्थापित करने में मदद मिल सकती है। लेकिन ऐसी व्यवस्था की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि जिम्मेदारियों का निर्धारण कितना स्पष्ट है और निर्णयों की निगरानी के लिए कितनी स्वतंत्र व्यवस्था मौजूद है।

झारखंड में ऊर्जा और खनन विभाग के ये उदाहरण एक व्यापक प्रशासनिक प्रश्न सामने रखते हैं; क्या एक ही अधिकारी के पास कई अहम पद होने से कामकाज अधिक सुगम हो सकता है, या कुछ परिस्थितियों में स्वतंत्र समीक्षा और जवाबदेही की प्रक्रिया चुनौतीपूर्ण बन सकती है?

इसका उत्तर केवल पदों की संख्या से नहीं, बल्कि संबंधित नियमों, सरकारी आदेशों, वास्तविक निर्णय प्रक्रिया और निगरानी के तंत्र से तय होगा। इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले नियुक्ति आदेशों, प्रत्यायोजित शक्तियों, संबंधित फाइलों और लागू नियमों की समीक्षा आवश्यक है। बहुस्तरीय जिम्मेदारियां संभाल रहे अधिकारियों की भूमिका के साथ-साथ संबंधित विभागों और अधिकारियों का पक्ष भी शामिल किया जाना चाहिए, ताकि सरकारी फैसलों में पारदर्शिता, निष्पक्षता और संस्थागत जवाबदेही का संतुलित आकलन किया जा सके।

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