झारखंड पुलिस मुख्यालय की ओर से सहायक अवर निरीक्षकों (ASI) की वरीयता सूची में किए गए बदलाव को लेकर विभाग के भीतर असंतोष बढ़ गया है। दिसंबर 2025 में जारी छठी सूची में रीडर संवर्ग के कर्मचारियों को शामिल किए जाने पर वरिष्ठ एएसआई ने आपत्ति जताई है। उनका आरोप है कि इस फैसले से लंबे समय से प्रोन्नति की प्रतीक्षा कर रहे पुलिसकर्मियों की वरिष्ठता प्रभावित हुई है। विरोध कर रहे कर्मियों ने पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच कराने और पुलिस महानिदेशक तदाशा मिश्रा से हस्तक्षेप करने की मांग की है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्ष 2017 से दिसंबर 2025 के बीच एएसआई की वरीयता सूची छह बार जारी की गई। इनमें वर्ष 2017, 2020 और 2023 में सूचियां प्रकाशित हुईं, जबकि वर्ष 2025 में भी दो बार सूची जारी की गई। विरोध कर रहे पुलिसकर्मियों का कहना है कि 26 जून 2025 तक प्रकाशित किसी भी सूची में रीडर संवर्ग के कर्मचारियों को शामिल नहीं किया गया था।
उनके मुताबिक, 24 दिसंबर 2025 को जारी छठी सूची में पहली बार रीडर संवर्ग के कर्मियों को जगह दी गई। इसी बदलाव को लेकर विवाद खड़ा हुआ है। वरिष्ठ एएसआई का सवाल है कि जब पहले की सूचियों में इस संवर्ग को शामिल नहीं किया गया, तो बाद में किस आधार पर यह व्यवस्था लागू की गई।
अलग संवर्ग होने के बावजूद वरिष्ठता में शामिल करने पर आपत्ति
विरोध कर रहे पुलिसकर्मियों का कहना है कि रीडर संवर्ग का कैडर एएसआई संवर्ग से अलग है। ऐसे में दोनों संवर्गों के कर्मचारियों को एक ही वरीयता सूची में शामिल करने के नियम और आधार स्पष्ट किए जाने चाहिए। उनका दावा है कि रीडर संवर्ग में 100 से अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं और उन्हें सूची में शामिल करने से नियमित एएसआई की वरिष्ठता पर असर पड़ा है।
पुलिसकर्मियों को आशंका है कि इस बदलाव के कारण उनकी प्रोन्नति की संभावनाएं प्रभावित हो सकती हैं। उनका कहना है कि वर्षों की सेवा के बाद भी पदोन्नति का इंतजार कर रहे कर्मचारियों के हितों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए।
निष्पक्ष जांच और डीजीपी के हस्तक्षेप की मांग
वरिष्ठ एएसआई ने सूची तैयार करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए बदलाव के पीछे अपनाए गए नियमों और प्रशासनिक आधार को सार्वजनिक करने की मांग की है। उनका कहना है कि पहले जारी सूचियों में लागू नहीं रहे प्रावधान को अचानक शामिल किए जाने से विभागीय पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
प्रभावित पुलिसकर्मियों ने मामले की निष्पक्ष जांच कर विवादित सूची की समीक्षा करने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि उनकी आपत्तियों का समाधान नहीं हुआ, तो वे अपने अधिकारों के लिए आगे कानूनी या अन्य उचित विकल्पों पर विचार करेंगे।
हालांकि, उपलब्ध जानकारी में पुलिस मुख्यालय की ओर से इस बदलाव के औचित्य पर आधिकारिक पक्ष सामने नहीं आया है। ऐसे में विवाद के समाधान के लिए संबंधित नियमों और सूची तैयार करने की प्रक्रिया पर मुख्यालय का स्पष्टीकरण महत्वपूर्ण होगा।





