Wednesday, October 7, 2026
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दक्षिण भारत में हिंदी विरोध की धारणा को बताया गलत, दीपक मिश्रा बोले- भारतीय भाषाओं के साथ हिंदी का प्रयोग बढ़ाना जरूरी

by उर्वशी शेखर
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लखनऊ में आयोजित हिंदी पखवाड़ा कार्यक्रम के दौरान हिंदी जन अभियान के राष्ट्रीय अध्यक्ष और समाजवादी चिंतक दीपक मिश्रा ने दक्षिण भारत में हिंदी को लेकर प्रचलित धारणा पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कर्नाटक, केरल, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु की यात्रा के दौरान उन्हें हिंदी के प्रति लोगों का अपनापन और सम्मान देखने को मिला। उनके अनुसार, इन राज्यों में हिंदी का व्यापक स्तर पर विरोध होने की बात वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाती।

एक डिग्री कॉलेज के सभागार में स्नातक विद्यार्थियों से बातचीत करते हुए मिश्रा ने हिंदी को देश की एकता से जोड़ने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि हिंदी के साथ-साथ देश की अन्य भारतीय भाषाओं का इस्तेमाल आम जीवन में बढ़ना चाहिए। उनका मानना है कि भारतीय भाषाओं के अधिक प्रयोग से लोगों में भारतीयता और राष्ट्र के प्रति जुड़ाव की भावना मजबूत हो सकती है।

मिश्रा ने कहा कि गैर-हिंदी भाषी राज्यों में भी बड़ी संख्या में लोग हिंदी को अपनाते हैं और इसे राष्ट्रीय पहचान के एक माध्यम के रूप में देखते हैं। उन्होंने संविधान के भाग-17 और अनुच्छेद 343 में हिंदी को लेकर किए गए प्रावधानों का उल्लेख करते हुए शासन, प्रशासन और न्याय व्यवस्था में हिंदी के अधिक इस्तेमाल की वकालत की।

उन्होंने विदेशों का उदाहरण देते हुए कहा कि नेपाल, थाईलैंड, कंबोडिया और अरब देशों सहित कई जगहों पर वाहनों की नंबर प्लेट स्थानीय भाषाओं में दिखाई देती हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने लोगों से दुकानों और प्रतिष्ठानों के नाम हिंदी में लिखने वाले व्यापारियों को प्राथमिकता देने की अपील की।

गांधी से नेताजी तक हिंदी के समर्थन का किया उल्लेख

दीपक मिश्रा ने अपने संबोधन में हिंदी और भारतीय भाषाओं के प्रचार-प्रसार में ऐतिहासिक रूप से योगदान देने वाले विभिन्न नेताओं और साहित्यिक व्यक्तित्वों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी और महर्षि दयानंद सरस्वती ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की मांग का समर्थन किया था। दोनों का संबंध गुजरात से था।

उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस का उदाहरण देते हुए कहा कि आजाद हिंद सरकार में हिंदी को राष्ट्रभाषा के तौर पर स्थान दिया गया, जबकि बोस स्वयं बांग्लाभाषी थे और उनका जन्म कटक में हुआ था।

मिश्रा ने बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय, रामास्वामी अय्यर और अन्य प्रमुख व्यक्तित्वों का भी उल्लेख किया, जिनके बारे में उन्होंने कहा कि उन्होंने हिंदी के पक्ष में आवाज उठाई। उन्होंने छत्रपति शिवाजी द्वारा हिंदी कवि भूषण को राजकवि बनाए जाने को भी हिंदी के ऐतिहासिक महत्व से जोड़ते हुए अपनी बात रखी।

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