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संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) ने अक्टूबर 2026 में अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे कर लिए हैं। देश में उच्च स्तरीय सरकारी सेवाओं के लिए प्रतिभाओं के चयन में आयोग की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। योग्यता आधारित चयन, निष्पक्ष प्रक्रिया और पारदर्शिता के जरिए UPSC ने भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था के लिए अधिकारियों की कई पीढ़ियां तैयार की हैं। आयोग की शताब्दी को देश की लोक सेवा व्यवस्था के विकास की एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है।
1926 में हुई थी लोक सेवा आयोग की शुरुआत
UPSC की मौजूदा संरचना तक पहुंचने का सफर स्वतंत्रता से पहले शुरू हुआ था। भारत सरकार अधिनियम, 1919 के प्रावधानों के तहत 1 अक्टूबर 1926 को भारत में पहली बार लोक सेवा आयोग अस्तित्व में आया। इसकी भूमिका मुख्य रूप से सलाह देने वाली संस्था की थी। सर रॉस बार्कर इसके प्रथम अध्यक्ष नियुक्त किए गए थे।
इसके बाद भारत सरकार अधिनियम, 1935 के तहत आयोग के स्वरूप में बदलाव हुआ और 1937 में इसे फेडरल पब्लिक सर्विस कमीशन के नाम से जाना जाने लगा। देश के गणतंत्र बनने के साथ 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ और इसी के साथ आयोग को वर्तमान नाम ‘संघ लोक सेवा आयोग’ यानी UPSC मिला।
आयोग से पहले भी होती थी प्रतियोगी परीक्षा
भारत में सरकारी सेवाओं में योग्यता के आधार पर चयन की व्यवस्था UPSC बनने से कई दशक पहले शुरू हो चुकी थी। ईस्ट इंडिया कंपनी की पुरानी नामांकन व्यवस्था को समाप्त करते हुए 1855 में लंदन में इंडियन सिविल सर्विस की प्रतियोगी परीक्षा शुरू की गई थी। परीक्षा विदेश में और अंग्रेजी माध्यम से होने के बावजूद भारतीयों ने इसमें अपनी जगह बनाई।
सत्येंद्रनाथ टैगोर ने 1863 में ICS परीक्षा उत्तीर्ण कर पहले भारतीय ICS अधिकारी बनने का गौरव हासिल किया। भारतीयों की लंबे समय से चली आ रही मांग के बाद 1922 में ICS परीक्षा पहली बार लंदन के अलावा भारत में भी आयोजित की गई। इसके लिए इलाहाबाद, जिसे अब प्रयागराज के नाम से जाना जाता है, को परीक्षा केंद्र बनाया गया।

1924 में गठित ली कमीशन की सिफारिशों ने भारत में एक वैधानिक लोक सेवा आयोग की स्थापना का रास्ता तैयार किया। इसके बाद 1926 में केंद्रीय स्तर पर लोक सेवा आयोग की स्थापना हुई।
संविधान ने दी आयोग को स्वतंत्र पहचान
आज UPSC की स्वायत्तता और निष्पक्षता को संवैधानिक संरक्षण हासिल है। भारतीय संविधान के भाग XIV में अनुच्छेद 315 से 323 तक संघ और राज्य लोक सेवा आयोगों से संबंधित प्रावधान किए गए हैं। इसके तहत केंद्र के लिए UPSC, राज्यों के लिए राज्य लोक सेवा आयोग और दो या अधिक राज्यों के लिए संयुक्त लोक सेवा आयोग के गठन की व्यवस्था है।
आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति, उनके कार्यकाल तथा पद से हटाने की प्रक्रिया के लिए संविधान में विशेष प्रावधान किए गए हैं। इसका उद्देश्य आयोग को राजनीतिक हस्तक्षेप और किसी भी बाहरी दबाव से मुक्त रखते हुए स्वतंत्र तरीके से काम करने की व्यवस्था सुनिश्चित करना है।
इन प्रमुख परीक्षाओं की जिम्मेदारी UPSC पर
UPSC हर साल देश की कई महत्वपूर्ण केंद्रीय सेवाओं के लिए प्रतियोगी परीक्षाएं आयोजित करता है। इनमें प्रमुख रूप से सिविल सेवा परीक्षा शामिल है, जिसके जरिए भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS), भारतीय पुलिस सेवा (IPS) और अन्य केंद्रीय सेवाओं के लिए चयन होता है।
इसके अलावा आयोग भारतीय वन सेवा परीक्षा, इंजीनियरिंग सेवा परीक्षा, संयुक्त चिकित्सा सेवा परीक्षा, राष्ट्रीय रक्षा अकादमी एवं नौसेना अकादमी परीक्षा, संयुक्त रक्षा सेवा परीक्षा और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों से जुड़ी भर्ती परीक्षाएं भी आयोजित करता है।
एक सदी के इस सफर में UPSC केवल भर्ती परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था नहीं रहा, बल्कि देश की प्रशासनिक व्यवस्था में योग्य और सक्षम मानव संसाधन उपलब्ध कराने वाली प्रमुख संवैधानिक संस्था के रूप में अपनी पहचान मजबूत करता गया है।