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हैदराबाद में मानसून के बाद जल संकट गहराया, टैंकरों की मांग में उछाल; सिंगूर जलाशय में बचा महज 11% पानी

by उर्वशी शेखर
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मानसून की विदाई के साथ ही हैदराबाद में पानी की किल्लत बढ़ने लगी है। आमतौर पर गर्मियों में बढ़ने वाली पानी के टैंकरों की मांग इस बार अक्टूबर में ही रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। जल बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर में अब तक 62,565 टैंकर बुक किए जा चुके हैं, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह संख्या 18,806 थी। यानी सालाना आधार पर मांग में करीब 233 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

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शहर में प्रतिदिन लगभग 8,000 टैंकरों की बुकिंग हो रही है। इसका असर रिहायशी इलाकों, अपार्टमेंट और आईटी कार्यालयों में साफ दिखने लगा है। कई जगह रोजमर्रा की जरूरतों के लिए टैंकरों पर निर्भरता बढ़ गई है। कम बारिश, भूजल स्तर में गिरावट और जलाशयों में घटते भंडार ने आने वाले महीनों में पानी की आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ा दी है।

बासर विश्वविद्यालय में ऑनलाइन कक्षाओं का सहारा

पानी की कमी का असर अब शैक्षणिक संस्थानों पर भी पड़ रहा है। तेलंगाना के बासर स्थित एक विश्वविद्यालय ने जल संकट के कारण सोमवार से ऑनलाइन कक्षाएं संचालित करने का फैसला लिया है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, संस्थान को प्रतिदिन करीब 25 लाख लीटर पानी की आवश्यकता होती है, जबकि मौजूदा आपूर्ति लगभग 10 लाख लीटर ही है।

हैदराबाद के तेजी से विकसित हो रहे रिहायशी क्षेत्रों में भी स्थिति चुनौतीपूर्ण होती जा रही है। बोडुप्पल में पिछले साल की तुलना में टैंकरों की मांग 22 गुना तक बढ़ने की जानकारी सामने आई है। इसके अलावा, शहर में करीब 20 हजार बोरवेल सूखने की बात कही जा रही है। जल बोर्ड ने लोगों से पानी का इस्तेमाल सावधानी से करने और खपत में 20 प्रतिशत तक कटौती करने की अपील की है।

झील के पास कथित अवैध बोरवेल से पानी की बिक्री

जल संकट के बीच पानी के कथित अवैध कारोबार का मामला भी सामने आया है। सुन्नम चेरुवु झील के आसपास कुछ घरों में बिस्तरों के नीचे और रसोईघरों के भीतर बोरवेल लगाए जाने की जानकारी मिली। बताया गया कि इन बोरवेल से पाइपलाइन के जरिए पानी स्टोरेज टैंकों तक पहुंचाया जाता था और फिर बड़े टैंकरों के माध्यम से उसकी बिक्री की जाती थी।

रिपोर्टों के मुताबिक, ड्रोन की मदद से इस नेटवर्क का पता लगाया गया। इसके बाद 15 बोरवेल और उनसे जुड़ी पाइपलाइनें हटाई गईं। पानी की कमी के बीच इस तरह की गतिविधियों ने जल संसाधनों के इस्तेमाल और निगरानी को लेकर सवाल खड़े किए हैं।

कम बारिश से भूजल पर बढ़ा दबाव

इस साल हैदराबाद में बारिश की स्थिति भी चिंता बढ़ाने वाली रही। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, शहर में सामान्य 627 मिमी के मुकाबले 558 मिमी बारिश दर्ज की गई। महानगर के 16 में से 13 मंडलों में वर्षा सामान्य से कम रही। चारमीनार क्षेत्र में बारिश की कमी 39 प्रतिशत, जबकि सैदाबाद में 38 प्रतिशत बताई गई है।

कम वर्षा का असर भूजल स्तर पर भी पड़ा है। सितंबर 2025 की तुलना में सितंबर 2026 में ग्रेटर हैदराबाद और आसपास के शहरी इलाकों में भूजल स्तर 22.5 फीट नीचे जाने की जानकारी दी गई है। इससे बोरवेल पर निर्भर इलाकों में पानी की उपलब्धता और प्रभावित होने की आशंका है।

सिंगूर जलाशय में क्षमता का करीब 11 प्रतिशत पानी

हैदराबाद की जलापूर्ति के प्रमुख स्रोतों में शामिल सिंगूर जलाशय की स्थिति भी गंभीर बताई जा रही है। इसकी कुल क्षमता 29.91 टीएमसी है। 17 अक्टूबर को जलाशय में केवल 3.416 टीएमसी पानी बचा था, जो इसकी कुल क्षमता का लगभग 11.4 प्रतिशत है।

आकलन के मुताबिक, मौजूदा दर से पानी की निकासी जारी रहने पर सामान्य आपूर्ति के लिए उपलब्ध भंडार 9 नवंबर तक ही पर्याप्त हो सकता है। वहीं, विशेष पंपों की मदद से पानी निकालने की स्थिति में आपूर्ति को 10 दिसंबर तक जारी रखने की संभावना जताई गई है। हालांकि, वास्तविक स्थिति पानी की खपत, निकासी और उपलब्ध संसाधनों पर निर्भर करेगी।

दक्षिण भारत के जलाशयों में भी घटा भंडार

जल संकट की चिंता केवल हैदराबाद तक सीमित नहीं है। केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के अनुसार, देश के 178 प्रमुख जलाशयों में करीब 123.2 अरब घन मीटर पानी उपलब्ध है, जो उनकी कुल भंडारण क्षमता का लगभग 67 प्रतिशत है।

दक्षिण भारत के जलाशयों की स्थिति अपेक्षाकृत अधिक चिंताजनक बताई गई है। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना के 50 प्रमुख जलाशयों में पानी का भंडार उनकी कुल क्षमता के करीब 42 प्रतिशत तक बताया गया है।

हैदराबाद में टैंकरों की बढ़ती मांग, गिरते भूजल स्तर और सिंगूर जलाशय में सीमित भंडार ने जल प्रबंधन की चुनौती बढ़ा दी है। यदि आने वाले समय में बारिश और जल भंडारण की स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो शहर में नियमित जलापूर्ति बनाए रखना प्रशासन के लिए और मुश्किल हो सकता है।

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