पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए 27.16 लाख नामों के खिलाफ अपीलों की सुनवाई कर रहे ट्रिब्यूनल जजों ने चुनाव आयोग के डिजिटल पोर्टल की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित इन ट्रिब्यूनलों में शामिल एक दर्जन से अधिक न्यायाधीशों ने कहा है कि तकनीकी खामियों के कारण अपीलों के निपटारे में दिक्कत आ रही है।
ट्रिब्यूनल ने इन खामियों को चिह्नित किया:
-संबंधित पक्ष को नोटिस भेजने का विकल्प नहीं।
-अपीलकर्ताओं से अतिरिक्त दस्तावेज मंगाने या अपलोड कराने की सुविधा नहीं।
-वर्चुअल सुनवाई की व्यवस्था नहीं।
-आदेश के बाद मतदाता का नाम दोबारा सूची में जोड़ने का विकल्प नहीं।
-अपीलकर्ता ट्रिब्यूनल का आदेश डाउनलोड नहीं कर सकते।
इन शिकायतों का उल्लेख 11 अगस्त की ट्रिब्यूनल बैठक के कार्यवृत में किया गया था। इन्हें चुनाव आयोग और कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पास भी भेजा गया।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बनी व्यवस्था
SIR के दौरान हटाए गए मतदाताओं को अपील का मौका देने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 10 मार्च को सेवानिवृत्त हाई कोर्ट जजों वाले ट्रिब्यूनल बनाने का निर्देश दिया था। इसके बाद बंगाल, ओडिशा और झारखंड के सैकड़ों न्यायिक अधिकारियों ने मतदाता सूची से जुड़े मामलों की जांच की। विधानसभा चुनाव से कुछ सप्ताह पहले बंगाल में 27.16 लाख नाम हटाए गए।
ट्रिब्यूनल में नियुक्त दो न्यायाधीशों ने बाद में निजी कारणों से इस्तीफा दिया, जिसके बाद उनकी जगह नए पूर्व न्यायाधीश नियुक्त किए गए।
ECINET पर भी उठ चुके हैं सवाल
चुनाव आयोग की डिजिटल व्यवस्था को लेकर इससे पहले भी सवाल सामने आए हैं। एक मीडिया जांच में दावा किया गया था कि दो चुनाव आयुक्तों ने 10 महीने में मतदान अधिकार से जुड़े फैसलों पर 14 बार असहमति जताई। इनमें ECINET और मतदाता सूची तैयार करने वाले जमीनी अधिकारियों की डिजिटल पहुंच से जुड़ी चिंताएं भी शामिल थीं।इसके बाद आयोग ने ECINET की स्वतंत्र समीक्षा और कानूनी अनुपालन की जांच के लिए विशेषज्ञों की समिति बनाने की घोषणा की थी।
SIR विवाद का राजनीतिक असर भी रहा है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जीत के बाद तृणमूल कांग्रेस ने मतदाता सूची से नाम हटाए जाने को हार की एक वजह बताया था। हालांकि, इस दावे के समर्थन में निर्णायक तथ्य सामने नहीं आए हैं।
हैदराबाद से विश्वनाथ देहाती की रिपोर्ट