Tuesday, October 6, 2026
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जितिया व्रत 2026: कब है जीवित्पुत्रिका व्रत? जानें तिथि, मुहूर्त और पारण का समय

by उर्वशी शेखर
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जीवित्पुत्रिका व्रत, जिसे आम बोलचाल में जितिया या जिउतिया भी कहा जाता है, इस वर्ष 3 अक्टूबर 2026, शनिवार को रखा जाएगा। संतान की दीर्घायु, बेहतर स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना से रखा जाने वाला यह व्रत बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में विशेष धार्मिक महत्व रखता है। परंपरा के अनुसार व्रती महिलाएं इस दिन कठिन उपवास रखते हुए भगवान जीमूतवाहन की पूजा करती हैं और व्रत से जुड़ी कथाओं का श्रवण करती हैं।

पंचांग के अनुसार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 3 अक्टूबर की सुबह करीब 7:59 बजे शुरू होगी और 4 अक्टूबर की सुबह लगभग 5:51 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के आधार पर जितिया का मुख्य उपवास 3 अक्टूबर को ही रखा जाएगा।

जितिया की धार्मिक परंपरा को आम तौर पर तीन दिनों में पूरा किया जाता है। इसकी शुरुआत पहले दिन नहाय-खाय से होती है। इस दौरान व्रती स्नान आदि के बाद सात्विक भोजन ग्रहण कर अगले दिन के उपवास की तैयारी करती हैं। दूसरे दिन अष्टमी तिथि पर मुख्य व्रत रखा जाता है। इसके बाद नवमी तिथि में पारण के साथ व्रत का समापन होता है।

प्रदोष काल में पूजा का विशेष महत्व

जितिया की पूजा के लिए प्रदोष काल को महत्वपूर्ण माना जाता है। उपलब्ध पंचांग गणना के मुताबिक 3 अक्टूबर को प्रदोष काल शाम करीब 6:05 बजे से रात 8:29 बजे तक रहेगा। इसी दौरान भगवान जीमूतवाहन की पूजा, व्रत कथा और आरती की जा सकती है।

प्रमुख तिथियां और समय:

  • अष्टमी आरंभ: 3 अक्टूबर, सुबह करीब 7:59 बजे
  • अष्टमी समाप्त: 4 अक्टूबर, सुबह करीब 5:51 बजे
  • प्रदोष काल: 3 अक्टूबर, शाम 6:05 बजे से रात 8:29 बजे तक
  • पारण: 4 अक्टूबर को नवमी तिथि में, सुबह करीब 7:28 बजे के बाद

हालांकि धार्मिक अनुष्ठानों के समय में स्थान के अनुसार अंतर हो सकता है। इसलिए व्रत और पारण के लिए स्थानीय पंचांग में दिए गए समय को प्राथमिकता देना उचित होगा।

किन चीजों से होगी जितिया की पूजा?

पूजा की सामग्री स्थानीय परंपरा के अनुसार कुछ अलग हो सकती है। सामान्य तौर पर कलश, जल, रोली, सिंदूर, अक्षत, फूल, माला, धूप, दीपक, घी या तेल, फल, मिठाई, पान-सुपारी, नैवेद्य और तिल जैसी सामग्री रखी जाती है।

कई इलाकों में भगवान जीमूतवाहन की पूजा के साथ चील और सियारिन के प्रतीक या आकृतियां बनाकर उनकी भी पूजा करने की परंपरा है।

कैसे करें जितिया की पूजा?

व्रत के दिन सुबह स्नान के बाद स्वच्छ कपड़े पहनकर उपवास का संकल्प लिया जाता है। पूजा स्थल की सफाई करने के बाद कलश स्थापित किया जाता है। इसके बाद भगवान जीमूतवाहन के प्रतीक या प्रतिमा को पूजा स्थल पर रखा जाता है।

परंपरा के अनुसार उन्हें जल, अक्षत, फूल, सिंदूर और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। दीप और धूप जलाकर संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और कल्याण की प्रार्थना की जाती है। शाम के समय प्रदोष काल में मुख्य पूजा के बाद जितिया की कथा सुनी या पढ़ी जाती है। अंत में आरती की जाती है।

जीमूतवाहन से जुड़ी है प्रमुख पौराणिक मान्यता

जितिया व्रत से जुड़ी प्रमुख कथा राजा जीमूतवाहन के त्याग और करुणा पर आधारित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार वे दयालु और धर्मनिष्ठ राजा थे। कथा में बताया गया है कि एक नाग को गरुड़ से बचाने के लिए जीमूतवाहन ने स्वयं को उसके स्थान पर प्रस्तुत करने का निर्णय लिया।

उनके त्याग और करुणा से जुड़ी इसी कथा को संतान की रक्षा और कल्याण की कामना से जोड़ा जाता है। इसी वजह से जितिया व्रत में भगवान जीमूतवाहन की आराधना का विशेष महत्व माना जाता है।

चील-सियारिन की लोककथा भी सुनने की परंपरा

जीमूतवाहन की कथा के अलावा कई क्षेत्रों में जितिया के अवसर पर चील और सियारिन से जुड़ी लोककथा भी सुनाई जाती है। इस कथा के माध्यम से व्रत के नियम, आस्था और उसके पालन से संबंधित प्रसंग बताए जाते हैं।

चील-सियारिन की कथा का स्वरूप अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों में कुछ भिन्न हो सकता है। ऐसे में व्रती महिलाएं अपनी स्थानीय धार्मिक परंपरा के अनुसार कथा सुनती हैं।

4 अक्टूबर को होगा पारण

जितिया व्रत का पारण 4 अक्टूबर 2026, रविवार को नवमी तिथि में किया जाएगा। उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार सुबह करीब 7:28 बजे के बाद पारण किया जा सकता है।

पारण से पहले स्नान और पूजा करने के बाद भगवान को भोग अर्पित किया जाता है। इसके बाद व्रत खोलकर भोजन ग्रहण करने की परंपरा है। शहर के अनुसार सूर्योदय और तिथि के समय में अंतर होने के कारण पारण का सटीक समय स्थानीय पंचांग से जांचना बेहतर रहेगा।

क्या हर जगह निर्जला रखा जाता है व्रत?

जितिया को कई परंपराओं में निर्जला उपवास के रूप में रखा जाता है। इसमें व्रत के दौरान भोजन के साथ पानी का सेवन भी नहीं किया जाता। हालांकि अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में उपवास के नियमों में अंतर पाया जाता है।

जो लोग स्वास्थ्य संबंधी किसी समस्या से जूझ रहे हों, उन्हें कठोर निर्जला उपवास रखने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना चाहिए। धार्मिक आस्था के साथ स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी जरूरी है।

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