Tuesday, October 6, 2026
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लोकतंत्र की चुनौतियों पर पुणे में मंथन, राष्ट्रीय सम्मेलन में बनेगी जनजागरण की रणनीति

by उर्वशी शेखर
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देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था, संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता, न्यायपालिका और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के लिए पुणे में दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। सिटीजन फॉर डेमोक्रेसी के इस आयोजन में समाजवादी विचारक, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद और लोकतंत्र समर्थक समूहों से जुड़े प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं।

सम्मेलन में प्रो. आनंद कुमार, सेवानिवृत्त न्यायाधीश और समाजवादी चिंतक टी. गोपाल सिंह, शशि शेखर सिंह, आशीष कोठारी, अविनाश पाटील, तुषार गांधी, गोविंद चव्हाण, प्रो. ईश्वर अहिरे, मनीष गुप्ते, श्रुति ताम्बे और ज्ञानेंद्र समेत कई लोगों के शामिल होने की जानकारी आयोजकों की ओर से दी गई है। इससे पहले 11 सितंबर को एसएम जोशी फाउंडेशन के सहयोग से यूथ फॉर डेमोक्रेसी सम्मेलन भी आयोजित किया गया।

सम्मेलन से जुड़े वक्ताओं ने देश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती बताया। वक्ताओं का आरोप है कि सांप्रदायिक राजनीति और बड़े पूंजीगत हितों का प्रभाव लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली को प्रभावित कर रहा है। उन्होंने कहा कि इन परिस्थितियों में संवैधानिक मूल्यों और नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए व्यापक जनजागरण की आवश्यकता है।

चुनाव परिणाम और सत्ता के केंद्रीकरण पर चर्चा

वक्ताओं ने पिछले लोकसभा चुनाव का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके आकलन में किसी एक दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने से सत्ता के केंद्रीकरण पर अंकुश लगा। सम्मेलन में शामिल वक्ताओं ने आशंका जताई कि यदि भविष्य में राजनीतिक परिस्थितियां बदलती हैं तो लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दबाव और बढ़ सकता है।

केंद्र सरकार और उसकी एजेंसियों की भूमिका पर भी सम्मेलन में सवाल उठाए गए। वक्ताओं का आरोप है कि ईडी, सीबीआई समेत केंद्रीय जांच एजेंसियों और नौकरशाही का इस्तेमाल राजनीतिक प्रभाव के लिए किया जा रहा है। हालांकि, ये सम्मेलन में वक्ताओं द्वारा लगाए गए राजनीतिक आरोप हैं।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर भी वक्ताओं ने चिंता व्यक्त की। उनका दावा है कि न्यायपालिका पर सरकार का प्रभाव बढ़ा है और कुछ न्यायिक फैसलों को वे इसी व्यापक चिंता के संदर्भ में देखते हैं। वक्ताओं ने 2018 में तत्कालीन सर्वोच्च न्यायालय के चार न्यायाधीशों द्वारा सार्वजनिक रूप से उठाए गए सवालों का भी संदर्भ दिया और इसे न्यायिक स्वतंत्रता से जुड़ी बहस का महत्वपूर्ण घटनाक्रम बताया।

चुनाव आयोग और SIR पर भी उठाए सवाल

चुनाव आयोग की भूमिका और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR का मुद्दा भी सम्मेलन के एजेंडे में है। सम्मेलन में वक्ताओं ने आरोप लगाया कि SIR की प्रक्रिया से बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम प्रभावित हो सकते हैं और इससे मतदान के अधिकार पर असर पड़ने की आशंका है।

वक्ताओं ने यह भी दावा किया कि यदि मतदाता सूची से विपक्ष समर्थक मतदाताओं के नाम बड़े पैमाने पर हटते हैं तो इसका आगामी चुनावों के परिणाम पर प्रभाव पड़ सकता है। ये भविष्य को लेकर व्यक्त की गई उनकी राजनीतिक आशंकाएं हैं।

न्यायपालिका में पारदर्शिता की मांग

सम्मेलन में न्यायपालिका की नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक स्वतंत्र और पारदर्शी बनाने के लिए कई प्रस्तावों पर चर्चा की जाएगी। आयोजकों की ओर से प्रस्तावित सुझावों में न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदोन्नति और तबादले में सरकार की भूमिका समाप्त या सीमित करना शामिल है।

इसके अलावा कॉलेजियम की निगरानी में नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने, चयन प्रक्रिया और साक्षात्कार की वीडियो रिकॉर्डिंग रखने तथा उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्ति से पहले उम्मीदवारों पर सार्वजनिक आपत्तियां आमंत्रित करने का सुझाव दिया गया है।

सम्मेलन के प्रस्तावित एजेंडे में यह मांग भी शामिल है कि सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को पांच वर्ष तक सरकारी पद स्वीकार करने और राजनीति में प्रवेश करने से रोका जाए। लंबित मामलों की संख्या को देखते हुए न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने, न्याय तक आम नागरिकों की पहुंच आसान बनाने और चुनाव सुधार से जुड़े मामलों को प्राथमिकता देने जैसे सुझाव भी रखे गए हैं।

आयोजकों ने न्यायपालिका में दलितों, पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों, आदिवासियों और महिलाओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की आवश्यकता भी बताई है।

जमीनी स्तर पर अभियान की योजना

सम्मेलन में लोकतांत्रिक मुद्दों को लेकर देशभर में जनजागरण अभियान चलाने का प्रस्ताव रखा गया है। आयोजकों के मुताबिक, इसके तहत सोशल मीडिया, ऑनलाइन बैठक, पदयात्रा, धरना, नुक्कड़ सभा, जनसभा और युवाओं के साथ संवाद जैसे माध्यमों का इस्तेमाल किया जाएगा।

कम से कम 10 राज्यों में युवाओं और बुद्धिजीवियों समेत स्थानीय समर्थकों का नेटवर्क तैयार करने तथा जिला स्तर पर नियमित बैठकें आयोजित करने का प्रस्ताव है। प्रत्येक जिले में समर्थकों का आधार बनाने और छोटे आर्थिक योगदान के जरिए अभियान के लिए संसाधन जुटाने पर भी चर्चा होगी।

आयोजकों ने लोकतंत्र से जुड़े मुद्दों को सांस्कृतिक माध्यमों से लोगों तक पहुंचाने के लिए चित्र प्रदर्शनी, संगीत और नाट्य दल तैयार करने का सुझाव दिया है। आंदोलन के लिए अलग राष्ट्रीय कोष बनाने तथा ऑनलाइन माध्यम से सहयोग जुटाने की योजना भी प्रस्तावित है।

इसके साथ यूथ फॉर डेमोक्रेसी से जुड़े दस्तावेजों, सम्मेलन के प्रस्तावों और लोकतांत्रिक विचारों पर आधारित सामग्री को पुस्तिकाओं के रूप में प्रकाशित करने का सुझाव दिया गया है।

सुझावों के क्रियान्वयन के लिए एक्शन कमेटी

आयोजकों के प्रस्ताव के अनुसार, सम्मेलन में सामने आने वाले सुझावों को लागू करने और उनकी निगरानी के लिए 10 सदस्यीय एक्शन कमेटी गठित की जाएगी। इसमें विशेष रूप से ऐसे युवाओं को शामिल करने पर जोर है, जो अभियान के लिए नियमित रूप से समय दे सकें।

अंतिम सत्र की अध्यक्षता हैदराबाद से सम्मेलन में शामिल हो रहे टी. गोपाल सिंह करेंगे। प्रो. आनंद कुमार, शशि शेखर सिंह और ज्ञानेंद्र भी सम्मेलन के विभिन्न सत्रों में भूमिका निभाएंगे। आयोजकों के अनुसार, महासचिव के ज्ञापन के बाद सम्मेलन का समापन किया जाएगा।

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