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झारखंड पुलिस में वर्ष 2018 में नियुक्त सब इंस्पेक्टरों की वरीयता को लेकर लंबे समय से चल रहा कानूनी विवाद अब फैसले के करीब पहुंचता दिखाई दे रहा है। मामला सीधी भर्ती से नियुक्त दरोगाओं और सीमित विभागीय परीक्षा के जरिए पदोन्नत होकर सब इंस्पेक्टर बने अधिकारियों के बीच वरिष्ठता क्रम से जुड़ा है।
सोमवार, 14 सितंबर को झारखंड हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति दीपक रोशन की एकलपीठ के समक्ष उत्तम तिवारी एवं अन्य बनाम झारखंड सरकार, WPC-3445/2025 मामले में सुनवाई हुई। दोनों पक्षों की ओर से अधिवक्ताओं ने अपनी दलीलें पूरी कर दीं। हालांकि, राज्य सरकार की ओर से अपना पक्ष रखने के लिए महाधिवक्ता ने अदालत से अतिरिक्त समय मांगा। अदालत ने सरकार की दलील सुनने के लिए 15 सितंबर को दोपहर 3 बजे का समय तय किया है।
इस सुनवाई के बाद अब मामले की अगली कार्यवाही पर सबकी नजर है, क्योंकि सरकार का पक्ष सामने आने के बाद विवाद पर अदालत का रुख और स्पष्ट होने की संभावना है।

वरीयता सूची पर पहले ही लग चुकी है रोक
इस मामले में हाईकोर्ट पहले ही पुलिस विभाग की पदोन्नति प्रक्रिया पर असर डालने वाला अंतरिम आदेश जारी कर चुका है। 2 सितंबर को अदालत ने राज्य सरकार की उस मांग को स्वीकार नहीं किया था, जिसमें वरीयता सूची पर लगी रोक हटाने का आग्रह किया गया था। अदालत ने रोक बरकरार रखते हुए अगली सुनवाई के लिए 14 सितंबर की तारीख निर्धारित की थी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज टंडन और अधिवक्ता सुमित गाड़ोदिया ने पूर्व की सुनवाई में सीधी भर्ती से नियुक्त दरोगाओं के पक्ष में तर्क रखा था। उनका कहना था कि नियुक्ति के समय लागू नियमों के अनुरूप सीधे चयनित अधिकारियों की सेवा वरीयता और अधिकारों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
विवाद की जड़ में दो अलग भर्ती प्रक्रियाएं
दरोगाओं की वरिष्ठता का विवाद वर्ष 2017 में JSSC द्वारा जारी दो अलग-अलग विज्ञापनों से शुरू हुआ। एक ओर विज्ञापन संख्या 05/2017 के तहत खुली प्रतियोगिता के माध्यम से सब इंस्पेक्टरों का चयन किया गया था। दूसरी ओर विभागीय कर्मचारियों के लिए सीमित विभागीय परीक्षा, विज्ञापन संख्या 09/2017, के जरिए भी दरोगाओं का चयन हुआ।

दोनों प्रक्रियाओं से चुने गए अभ्यर्थियों को वर्ष 2018 में नियुक्ति मिली। समस्या तब सामने आई जब विभागीय वरीयता सूची तैयार की गई। आरोप है कि सीमित विभागीय परीक्षा से नियुक्त दरोगाओं को सीधे भर्ती वाले दरोगाओं से ऊपर रखा गया।
सीधी भर्ती के अधिकारियों की आपत्ति है कि उनका भर्ती विज्ञापन पहले जारी हुआ था और चयन प्रक्रिया का क्रम भी पहले था। ऐसे में वरिष्ठता निर्धारित करते समय इस तथ्य को महत्व दिया जाना चाहिए था।
सीधी भर्ती वाले दरोगाओं ने उठाए नियमों पर सवाल
याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क है कि विज्ञापन संख्या 05/2017 सीमित विभागीय परीक्षा के विज्ञापन 09/2017 से पहले जारी हुआ था। इसके बावजूद तैयार की गई वरिष्ठता सूची में बाद वाली प्रक्रिया से नियुक्त अधिकारियों को ऊपर रखा गया।
याचिकाकर्ता पक्ष का कहना है कि इससे सीधे नियुक्त सब इंस्पेक्टरों की सेवा संबंधी स्थिति प्रभावित हो रही है। इसी आधार पर उन्होंने अदालत से विभाग द्वारा तैयार वरीयता व्यवस्था की न्यायिक समीक्षा की मांग की है।

इंस्पेक्टर पद पर प्रमोशन भी फिलहाल प्रभावित
वरीयता विवाद का सीधा असर आगे की पदोन्नति प्रक्रिया पर भी पड़ा है। हाईकोर्ट ने सब इंस्पेक्टर से इंस्पेक्टर पद पर होने वाली प्रोन्नति पर रोक लगा रखी है। यह अंतरिम व्यवस्था फिलहाल जारी है।
इसके अलावा अदालत ने गृह विभाग के माध्यम से सीमित विभागीय परीक्षा से नियुक्त संबंधित दरोगाओं और अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर उनका पक्ष और स्पष्टीकरण मांगा है।
अब 15 सितंबर की सुनवाई महत्वपूर्ण होगी। राज्य सरकार की दलीलें सुनने के बाद अदालत इस विवाद में आगे की दिशा तय करेगी। वरिष्ठता सूची, नियुक्ति के दोनों माध्यमों का क्रम और उससे जुड़े पदोन्नति अधिकारों पर आने वाला न्यायिक रुख झारखंड पुलिस के कई अधिकारियों की सेवा स्थिति को प्रभावित कर सकता है।