हजारीबाग डिटेंशन सेंटर में रह रही एक बांग्लादेशी महिला के साथ यौन उत्पीड़न के मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने गंभीर रुख अपनाया है। जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद की अध्यक्षता वाली खंडपीठ में हुई सुनवाई के दौरान जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) ने अपनी सीलबंद रिपोर्ट अदालत के समक्ष रखी। रिपोर्ट में तीन पुलिसकर्मियों द्वारा महिला के साथ दुष्कर्म किए जाने की पुष्टि की गई है।
राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि आरोपों के आधार पर तीनों कांस्टेबलों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर उन्हें निलंबित कर दिया गया है। प्राथमिकी में लगाई गई धाराओं को लेकर अदालत ने सवाल उठाया। इस पर महाधिवक्ता रोहित राय ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि एफआईआर में जरूरी कानूनी संशोधन किया जाएगा।
अदालत ने सरकार को पीड़ित महिला की सुरक्षा और उसके मूलभूत अधिकारों को ध्यान में रखते हुए डिटेंशन सेंटर में सभी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।
2021 में सजा पूरी, फिर भी डिपोर्ट नहीं हुई महिला
सुनवाई के दौरान विदेशी नागरिक से जुड़े मामले में सरकारी प्रक्रिया को लेकर हाईकोर्ट ने कई सवाल उठाए। अदालत ने जानना चाहा कि महिला की सजा 2021 में पूरी हो जाने के बाद उसे तत्काल बांग्लादेश क्यों नहीं भेजा गया। साथ ही 2026 में उसके बरी होने के बाद राज्य सरकार की ओर से फैसले के खिलाफ अपील नहीं किए जाने पर भी कोर्ट ने स्पष्टीकरण मांगा।

राज्य सरकार और गृह सचिव की ओर से बताया गया कि महिला को बांग्लादेश वापस भेजने के लिए वर्ष 2023 से केंद्र सरकार के विदेश मंत्रालय (MEA) से लगातार पत्राचार किया जा रहा है। हालांकि, अब तक मंत्रालय की ओर से कोई जवाब नहीं मिला है।
इस मामले में हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता को पूरे मामले पर बिंदुवार जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
2018 में दर्ज हुआ था मामला
महिला के खिलाफ वर्ष 2018 में बच्चे के अपहरण और फॉरेनर्स एक्ट के तहत मामले दर्ज किए गए थे। वर्ष 2021 में सजा पूरी होने के बाद उसे हजारीबाग डिटेंशन सेंटर भेज दिया गया था। बाद में 2026 में उसे मामले में बरी कर दिया गया।
हाईकोर्ट ने प्रार्थी को राज्य सरकार के जवाब पर अपना प्रतिउत्तर दाखिल करने के लिए समय दिया है। मामले की अगली सुनवाई अब 15 अक्टूबर को होगी।