देश के करीब 16 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूची के वार्षिक Special Summary Revision (SSR) को लेकर स्थिति अब भी स्पष्ट नहीं है। सामान्य तौर पर इस प्रक्रिया की शुरुआत मई से जुलाई के बीच हो जाती है, लेकिन 2026 के लिए अब तक इसकी औपचारिक घोषणा नहीं हुई है। ऐसे में मतदाता सूची के वार्षिक संशोधन में देरी को लेकर चुनाव आयोग के भीतर चल रही चर्चाओं पर ध्यान केंद्रित हो गया है।
मामले से जुड़े सूत्रों के अनुसार, आयोग के शीर्ष अधिकारियों के बीच SSR की प्रक्रिया और इसके कानूनी आधार को लेकर महत्वपूर्ण मतभेद सामने आए हैं। इस चर्चा में अटॉर्नी जनरल की कानूनी राय के साथ-साथ करीब चार दशक पुराने रामकृष्ण हेगड़े बनाम भारत निर्वाचन आयोग मामले को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
योग्यता तिथियों को लेकर उठे सवाल
सूत्रों के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इस बात पर जोर दिया कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया को निर्धारित कानूनी ढांचे के अनुरूप ही आगे बढ़ाया जाना चाहिए। उनका तर्क बताया जा रहा है कि आयोग द्वारा तय की गई चार योग्यता तिथियां SSR की प्रक्रिया से सीधे जुड़ी हैं।
इसका अर्थ यह है कि केवल नियमित मतदाता सूची अपडेट प्रक्रिया के तहत फॉर्म-6 जमा कर देने भर से नए मतदाता का नाम अंतिम मतदाता सूची में शामिल माना जाना पर्याप्त नहीं है। नाम को आधिकारिक सूची का हिस्सा मानने के लिए निर्धारित पुनरीक्षण प्रक्रिया और उसके बाद होने वाले प्रकाशन की भूमिका अहम है।
जनवरी की अंतिम सूची पर भी असर
इस व्यवस्था के चलते वार्षिक SSR पूरा होने और जनवरी में संशोधित मतदाता सूची प्रकाशित होने तक नए मतदाताओं के नाम की अंतिम स्थिति को लेकर सवाल बने रह सकते हैं।
जनवरी 2025 में भी निर्धारित वार्षिक SSR के तहत नई सूची प्रकाशित नहीं हो सकी थी। अब 2026 के चक्र में भी देरी होने से यह आशंका बढ़ी है कि नए मतदाताओं और मतदाता सूची में बदलाव चाहने वालों को निर्धारित वार्षिक प्रक्रिया का लाभ समय पर नहीं मिल पाएगा।
चार दशक पुराना हेगड़े मामला फिर चर्चा में
वर्तमान विवाद में 1980-81 के रामकृष्ण हेगड़े मामले का उल्लेख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें मतदाता सूची तैयार करने और उसमें बदलाव से जुड़े चुनाव आयोग के अधिकारों पर सवाल उठाए गए थे।
यह मामला उस समय सामने आया था जब जनता पार्टी के तत्कालीन महासचिव रामकृष्ण हेगड़े ने खेरी, गुलबर्गा और क्योंझर में 1981 के संसदीय उपचुनावों के लिए इस्तेमाल की गई मतदाता सूचियों की वैधता को चुनौती दी थी।
हेगड़े की दलील थी कि मतदाता सूची तैयार करने में Registration of Electors Rules, 1960 में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। उनका आरोप था कि इस प्रक्रिया में हुई गड़बड़ियों के कारण चुनाव से पहले कुछ मतदाता, विशेष रूप से नए और युवा मतदाता, अपने मतदान के अधिकार का इस्तेमाल करने से वंचित हो सकते हैं।
यही पुराना न्यायिक संदर्भ अब चुनाव आयोग के भीतर SSR की प्रक्रिया, नए मतदाताओं के अधिकार और मतदाता सूची में किसी बदलाव के लिए उसके आधार को लेकर चल रही बहस में दोबारा महत्वपूर्ण हो गया है।
हैदराबाद से विश्वनाथ देहाती की रिपोर्ट