Thursday, October 8, 2026
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तेलंगाना की सियासत में दलित सम्मान पर संग्राम, कांग्रेस और BRS आमने-सामने

by उर्वशी शेखर
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तेलंगाना के गठन को एक दशक से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन राज्य की राजनीति और सामाजिक व्यवस्था में पिछड़े वर्गों तथा दलितों की भागीदारी को लेकर सवाल अब भी कायम हैं। 2014 में आंध्र प्रदेश से अलग होकर अस्तित्व में आए तेलंगाना में राजनीतिक सत्ता पर लंबे समय से प्रभावशाली और अगड़ी जातियों का वर्चस्व रहा है। शिक्षा और स्कूलों में नामांकन जैसे क्षेत्रों में वंचित तबकों की स्थिति में कुछ सुधार जरूर हुआ है, लेकिन सामाजिक बराबरी, सम्मान और विकास के अवसरों में उनकी हिस्सेदारी अभी भी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं पहुंची है।

इसी बीच पिछले सप्ताह राज्य की राजनीति में ऐसा विवाद सामने आया, जिसने दलित सम्मान और राजनीतिक मर्यादा के मुद्दे को फिर बहस के केंद्र में ला दिया। खास बात यह रही कि यह विवाद उस समय सामने आया, जब मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी की सरकार अपने कार्यकाल के 1000 दिन पूरे होने का जश्न मना रही थी।

विपक्षी दल भारत राष्ट्र समिति (BRS) ने सरकार के जश्न के बीच विरोध प्रदर्शन के जरिए अपना राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की। 7 सितंबर को BRS के दो दर्जन से ज्यादा विधायक, करीब एक दर्जन विधान पार्षद और अन्य नेता काले कपड़े पहनकर तथा सरकार के खिलाफ पोस्टर लेकर विधानसभा परिसर में पहुंचने का प्रयास कर रहे थे। विधानसभा अध्यक्ष के निर्देश के बाद पुलिस ने उन्हें रोक दिया। इस दौरान नेताओं और पुलिस के बीच तीखी नोकझोंक हुई और स्थिति तब बिगड़ गई जब प्रदर्शनकारियों ने आगे बढ़ने की कोशिश की। आखिरकार BRS के कार्यकारी अध्यक्ष के. टी. रामा राव समेत 21 विधायकों को हिरासत में लिया गया।

मामला यहीं नहीं थमा। विधानसभा की कार्यवाही के दौरान BRS विधायकों ने गिरफ्तारी का मुद्दा उठाया और इसी दौरान विधानसभा अध्यक्ष गद्दम प्रसाद कुमार को लेकर कथित तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणियां की गईं। दलित समुदाय से आने वाले स्पीकर इन टिप्पणियों से भावुक हो गए। इसके बाद कांग्रेस नेता मोथा रोहित मुदिराज ने BRS विधायक टाटा मधु के खिलाफ शिकायत दर्ज कराते हुए कार्रवाई की मांग की।

विधानसभा अध्यक्ष ने मामले को गंभीरता से लेते हुए विपक्ष के संबंधित विधायकों को मानसून सत्र की शेष अवधि के लिए निलंबित कर दिया। हालांकि टाटा मधु ने अध्यक्ष के खिलाफ किसी तरह की गाली-गलौज करने से इनकार किया। उनका कहना था कि यदि उनके साथ ऐसी टिप्पणी जोड़ी गई है, तो उन्हें इसका खेद है।

विवाद ने इसके बाद राजनीतिक टकराव का नया रूप ले लिया। अगले ही दिन कांग्रेस ने सिद्धिपेट में BRS संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के एर्रावल्ली स्थित फार्महाउस तक मार्च निकालने की योजना बनाई। कांग्रेस के दलित नेताओं और विधायकों ने ढोल बजाकर प्रदर्शन किया और BRS पर दलित सम्मान को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाया।

इस घटनाक्रम के बाद एक पुराना राजनीतिक विवाद भी चर्चा में आ गया। इसकी तुलना उत्तराखंड के हल्द्वानी में सामने आए उस मामले से की गई, जब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की सभा के बाद रामलीला मैदान में कथित तौर पर ‘शुद्धि हवन’ किए जाने का विवाद उठा था। कांग्रेस ने उस घटना को दलित विरोधी मानसिकता से जोड़ते हुए दक्षिणपंथी संगठनों पर निशाना साधा था।

अब तेलंगाना में भी BRS नेताओं पर इसी तरह का आरोप लगाया गया। कांग्रेस के प्रदर्शन के बाद दावा किया गया कि BRS नेताओं ने एर्रावल्ली फार्महाउस में कथित तौर पर शुद्धिकरण अनुष्ठान कराया। हालांकि इस पूरे मामले ने दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप को और तेज कर दिया है।

कांग्रेस और BRS के बीच चल रही यह राजनीतिक लड़ाई भले ही सुर्खियां बटोर रही हो, लेकिन बड़ा सवाल तेलंगाना के दलितों और पिछड़े वर्गों की वास्तविक स्थिति को लेकर है। राजनीतिक दल एक-दूसरे पर सामाजिक न्याय के मुद्दे को लेकर निशाना साध रहे हैं, मगर जमीनी स्तर पर शिक्षा, रोजगार, प्रतिनिधित्व, सामाजिक सम्मान और विकास में वंचित समुदायों की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए अब भी ठोस और व्यापक प्रयासों की जरूरत बनी हुई है।

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