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हिंदी साहित्य में फणीश्वरनाथ रेणु का नाम केवल एक लेखक के रूप में नहीं, बल्कि उस पूरे ग्रामीण संसार की आवाज के तौर पर दर्ज है, जिसे लंबे समय तक साहित्य में हाशिये की चीज समझा जाता रहा। गांव, लोकभाषा, खेत-खलिहान, मेले, सामाजिक रिश्ते, गरीबी, राजनीति और आम आदमी के संघर्ष को उन्होंने अपनी रचनाओं का केंद्रीय विषय बनाया। यही कारण है कि रेणु की पहचान उनके पूरे नाम और उनकी अपनी भाषा-दुनिया से गहराई से जुड़ी रही।
इस पहचान का एक दिलचस्प प्रसंग उनकी कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ पर बनी फिल्म ‘तीसरी कसम’ से जुड़ा है। फिल्म के प्रचार की तैयारी के दौरान सुझाव दिया गया कि ‘फणीश्वरनाथ रेणु’ नाम अपेक्षाकृत लंबा है, इसलिए प्रचार सामग्री में इसे संक्षिप्त कर ‘पी. एन. रेणु’ लिखा जाए। लेकिन गीतकार और फिल्म से जुड़े प्रमुख व्यक्तित्व शैलेंद्र इस प्रस्ताव से सहमत नहीं हुए। उनका आग्रह था कि लेखक का पूरा नाम ही इस्तेमाल किया जाए।
यह घटना उस दौर की है जब मुंबई को आम तौर पर बंबई कहा जाता था। इसलिए ‘तीसरी कसम’ और रेणु से जुड़ी इस कहानी को उसी समय के सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ में देखना ज्यादा स्वाभाविक है। पहली नजर में यह केवल नाम छोटा करने या न करने का मामूली मामला लग सकता है, लेकिन इसके भीतर रेणु की साहित्यिक पहचान का एक महत्वपूर्ण पक्ष छिपा है।
गांव को पृष्ठभूमि नहीं, कथा का केंद्र बनाया
रेणु की रचनात्मक दुनिया महानगरों की चमक-दमक से दूर थी। उनका साहित्य उन लोगों के बीच से निकला, जिनकी जिंदगी गांवों और कस्बों में गुजरती थी। उन्होंने स्थानीय समाज को केवल कहानी के लिए इस्तेमाल की गई पृष्ठभूमि के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसी समाज को कथा का मुख्य पात्र बनाया।
उनके यहां खेतों से लेकर चौपाल तक, मेलों से लेकर राजनीतिक हलचल तक और गरीबी से लेकर प्रेम तक; जीवन का कोई पहलू अलग-थलग नहीं है। यही वजह है कि रेणु की रचनाएं पढ़ते हुए पाठक को केवल किसी एक गांव की कहानी नहीं मिलती, बल्कि उस पूरे सामाजिक ताने-बाने की तस्वीर दिखाई देती है, जिसमें अलग-अलग वर्ग, जातियां, रिश्ते और बदलती आकांक्षाएं साथ-साथ मौजूद हैं।
पूर्णिया की मिट्टी से निकली साहित्यिक आवाज
फणीश्वरनाथ रेणु का जन्म 4 मार्च 1921 को बिहार के पूर्णिया जिले के औराही हिंगना गांव में हुआ था। भारत-नेपाल सीमा के निकट का यह क्षेत्र उनके जीवन और रचनात्मक चेतना पर गहरा प्रभाव डालता रहा। उनकी शुरुआती पढ़ाई अररिया और फारबिसगंज में हुई।
बाद के वर्षों में वे समाजवादी विचारधारा और राजनीतिक गतिविधियों से जुड़े। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई और जेल भी गए। इसके बाद नेपाल के लोकतांत्रिक आंदोलन में उनकी भागीदारी रही। उनके राजनीतिक अनुभवों ने उनके साहित्य को भी प्रभावित किया। इसलिए रेणु के लेखन को उनके सामाजिक और राजनीतिक जीवन से अलग करके देखना आसान नहीं है।

‘मैला आंचल’ से बदली आंचलिक साहित्य की तस्वीर
साल 1954 में प्रकाशित ‘मैला आंचल’ ने हिंदी साहित्य में रेणु को एक अलग मुकाम दिया। उन्होंने खुद इसे ‘आंचलिक उपन्यास’ की संज्ञा दी थी। बाद में यह शब्द हिंदी साहित्य में एक व्यापक साहित्यिक अवधारणा के रूप में स्थापित हुआ।
हालांकि रेणु के लिए आंचलिकता का मतलब किसी सीमित भौगोलिक क्षेत्र तक कहानी को बांध देना नहीं था। पूर्णिया के इलाके को केंद्र में रखकर उन्होंने वहां के सामाजिक जीवन की व्यापक तस्वीर पेश की। बीमारी, आर्थिक तंगी, जातीय खिंचाव, राजनीति, रूढ़ियां, मानवीय रिश्ते और बदलाव की उम्मीद; सब उनके कथानक का हिस्सा बनते हैं।
रेणु की कहानियों में भाषा भी है पात्र
रेणु की रचनाओं की खासियत केवल उनके विषय नहीं, बल्कि उनकी भाषा भी है। उनके पात्र जिस इलाके से आते हैं, उनकी बोली और बोलने का अंदाज भी उसी परिवेश की पहचान बन जाता है। ‘पंचलाइट’, ‘ठेस’, ‘संवदिया’, ‘लाल पान की बेगम’ और ‘मारे गए गुलफाम’ जैसी रचनाओं में घटनाओं के साथ पूरा लोकजीवन चलता दिखाई देता है।
उनकी कथा-दृष्टि की खासियत यह थी कि वे साधारण लगने वाली घटनाओं में भी इंसानी भावनाओं और सामाजिक तनाव की गहरी परत खोज लेते थे। उनके पात्र बड़े ऐतिहासिक घटनाक्रम के नायक नहीं होते, लेकिन उनकी छोटी-छोटी खुशियां, तकलीफें, इच्छाएं और संघर्ष जीवन की बड़ी सच्चाइयों को सामने ले आते हैं।
रेणु ने हिंदी साहित्य को यह स्थापित करके दिखाया कि साहित्य की जमीन केवल महानगर, राजदरबार या बड़े ऐतिहासिक प्रसंग नहीं हैं। किसी गांव की पगडंडी, उसकी बोली और वहां रहने वाले आम लोगों की जिंदगी भी उतनी ही ताकत से साहित्य का केंद्र बन सकती है।
हैदराबाद से विश्वनाथ देहाती की विशेष रिपोर्ट