Wednesday, October 7, 2026
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कोयला खदानें होंगी बंद, लेकिन नहीं थमेगा विकास! गिरिडीह और करमा OCP से झारखंड में नई शुरुआत

by उर्वशी शेखर
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झारखंड में खनन के बाद की जमीन को बेकार छोड़ने के बजाय उसे नए आर्थिक और सामाजिक उपयोग में लाने की तैयारी शुरू हो गई है। राज्य सरकार ने गिरिडीह ओपन कास्ट प्रोजेक्ट और रामगढ़ जिले की करमा ओपन कास्ट परियोजना को इस दिशा में पायलट मॉडल के तौर पर आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है। दोनों परियोजनाओं के चयन की अनुशंसा भारत सरकार को भेजने पर रांची में हुई उच्चस्तरीय बैठक में सहमति बनी।

यह पहल केंद्र के कोयला मंत्रालय और जर्मनी की विकास सहयोग संस्था GIZ के साथ संचालित Technical Cooperation on To-be-Closed Coal Mines (TCCM) कार्यक्रम के तहत हो रही है। बैठक में खान एवं भूतत्व विभाग के सचिव अरवा राजकमल के अलावा कोयला मंत्रालय, कोल कंट्रोलर ऑर्गनाइजेशन, CCL, CMPDI और GIZ के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।

खदान बंदी के बाद की पूरी तस्वीर पर होगा काम

पायलट परियोजना का सबसे अहम हिस्सा दोनों खदानों के लिए विस्तृत Final Mine Closure and Repurposing Plan तैयार करना होगा। इसमें यह तय किया जाएगा कि खनन समाप्त होने के बाद जमीन और जल संसाधनों का किस तरह सुरक्षित एवं उत्पादक इस्तेमाल किया जा सकता है। पर्यावरणीय बहाली, मौजूदा आधारभूत ढांचे और स्थानीय अर्थव्यवस्था को दोबारा खड़ा करने के विकल्प भी योजना का हिस्सा होंगे।

सरकार की सोच है कि खदान का संचालन समाप्त होना किसी क्षेत्र के आर्थिक जीवन का अंत नहीं होना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय अनुभवों और आधुनिक तकनीकी उपायों को अपनाकर ऐसा मॉडल विकसित करने का प्रयास है, जिसे आगे देश के दूसरे खनन क्षेत्रों में भी इस्तेमाल किया जा सके।

सौर ऊर्जा से लेकर पर्यटन तक होंगे विकल्प

पुनर्पयोग की योजना में खनन के बाद उपलब्ध भूमि और संसाधनों के लिए कई संभावनाओं का परीक्षण किया जाएगा। इनमें नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्र, पर्यटन गतिविधियां, कृषि, बागवानी, मत्स्य पालन और कौशल विकास केंद्र जैसी गतिविधियां शामिल हैं।

इसका मकसद उन इलाकों में रोजगार और आय के वैकल्पिक साधन तैयार करना है, जहां लंबे समय तक स्थानीय अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा कोयला खनन पर निर्भर रहा है। खदान बंद होने के बाद भी क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियां जारी रहें, इसके लिए पहले से नियोजित पुनर्पयोग को प्राथमिकता दी जाएगी।

करमा OCP के आसपास आठ गांवों पर विशेष अध्ययन

रामगढ़ की करमा OCP के पांच किलोमीटर के प्रभाव क्षेत्र में आने वाले सुगिया, मरार, बोंगाबार, करमा, कैथा, कंडेर, लोढ़मा और पैंकी गांवों को विशेष अध्ययन के लिए चिह्नित किया गया है। यहां आबादी की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, कमजोर तबकों की परिस्थितियों और आजीविका से जुड़ी संभावनाओं का आकलन किया जा रहा है।

स्थानीय जरूरतों को योजना में जगह देने के लिए Mine Closure Advisory Committee का गठन भी किया गया है। इसके जरिए स्थानीय स्तर पर समन्वय और समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित करने का प्रयास होगा।

DPR में पर्यावरण और रोजगार दोनों पर जोर

परियोजना की विस्तृत DPR में भूमि के भविष्य के उपयोग, पर्यावरणीय पुनर्स्थापन, जल प्रबंधन, माइन वॉइड के प्रबंधन और मौजूदा आधारभूत सुविधाओं के पुनर्पयोग का खाका तैयार किया जाएगा। साथ ही उन स्थानों की पहचान की जाएगी, जहां नवीकरणीय ऊर्जा अथवा अन्य निवेश आधारित गतिविधियां व्यवहारिक रूप से विकसित की जा सकती हैं।

TCCM पहल का व्यापक उद्देश्य बंद होने वाली कोयला खदानों को वैज्ञानिक तरीके से बंद करने के साथ-साथ उनके बाद के उपयोग और प्रभावित समुदायों के सामाजिक-आर्थिक संक्रमण को भी व्यवस्थित करना है।

राज्य सरकार के मुताबिक, झारखंड जैसे खनन-प्रधान राज्य में यह जरूरी है कि खनिज भंडार समाप्त होने के बाद भी संबंधित क्षेत्र विकास की मुख्यधारा से बाहर न हों। गिरिडीह और करमा OCP से तैयार होने वाला मॉडल सफल रहा तो इसे भविष्य में राज्य और देश की दूसरी बंद होने वाली कोयला खदानों के लिए भी आधार बनाया जा सकता है।

इस तरह प्रस्तावित योजना का फोकस केवल ‘माइन क्लोजर’ पर नहीं, बल्कि ‘पोस्ट-माइनिंग डेवलपमेंट’ पर है, यानी जहां कभी कोयला निकाला जाता था, वहां आगे रोजगार, पर्यावरण संरक्षण और नई आर्थिक गतिविधियों की जमीन तैयार करना।

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