Tuesday, October 6, 2026
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NPU में डिग्री छपाई को लेकर गंभीर सवाल, बिना टेंडर 37 लाख का काम UP की कंपनी को देने का आरोप

by उर्वशी शेखर
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नीलांबर-पीतांबर विश्वविद्यालय (NPU), पलामू में छात्रों की डिग्रियां छपवाने की प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि विश्वविद्यालय के कुलपति दिनेश सिंह ने निर्धारित निविदा प्रक्रिया का पालन किए बिना उत्तर प्रदेश की एक प्रिंटिंग कंपनी को करीब 37 लाख रुपये की डिग्रियां छापने का काम सौंप दिया। मामला सामने आने के बाद न केवल प्रिंटर के चयन की प्रक्रिया, बल्कि एकरारनामा और भुगतान से जुड़ी पूरी व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है।

बताया जा रहा है कि प्रिंटिंग कंपनी की ओर से परीक्षा नियंत्रक को संबोधित करते हुए एक ऑफर भेजा गया था, जिसकी जानकारी कुलपति को भी दी गई थी। आरोप के अनुसार, तत्कालीन परीक्षा नियंत्रक अजीत सेठ ने उस प्रस्ताव को अनुमोदित नहीं किया। इसके बाद कुलपति की ओर से प्रस्ताव को परीक्षा नियंत्रक के ओएसडी गौरव कुमार के स्तर पर आगे बढ़ाया गया। इसी आधार पर फाइल तैयार हुई और बिना खुली निविदा के नामांकन प्रक्रिया के जरिए उत्तर प्रदेश के प्रिंटर को डिग्री छपाई का काम दे दिया गया।

सादे कागज पर हुआ करार, वैधानिक प्रक्रिया पर उठे सवाल

इस मामले में सबसे बड़ा सवाल प्रिंटर के साथ किए गए समझौते को लेकर है। आरोप है कि काम सौंपने के बाद विश्वविद्यालय ने संबंधित कंपनी के साथ निर्धारित प्रारूप में औपचारिक अनुबंध करने के बजाय सादे कागज पर ही एकरारनामा कर लिया।

विश्वविद्यालय के इतिहास में इस तरह के करार को पहली घटना बताया जा रहा है। सरकारी कार्यों के लिए अनुबंध की एक निर्धारित प्रक्रिया होती है, जिसमें संबंधित नियमों और औपचारिकताओं का पालन आवश्यक माना जाता है। ऐसे में सादे कागज पर हुए समझौते की वैधता को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

दीक्षांत समारोह पहले, डिग्री छपाई का फैसला बाद में!

मामले में तारीखों का अंतर भी चर्चा का विषय बना हुआ है। विश्वविद्यालय का तीसरा दीक्षांत समारोह 6 अक्टूबर 2025 को आयोजित किया गया था। वहीं, डिग्रियों की छपाई से संबंधित निर्णय परीक्षा बोर्ड की बैठक में 19 नवंबर 2025 को लिए जाने की बात सामने आई है।

दूसरी ओर, संबंधित प्रिंटर के साथ 13 अगस्त को ही एकरारनामा किए जाने का दावा किया जा रहा है। यानी डिग्री प्रिंटिंग के औपचारिक निर्णय से पहले ही अनुबंध किए जाने की बात सामने आने से प्रक्रिया की टाइमलाइन पर भी सवाल उठ रहे हैं।

37 लाख की छपाई और 1.20 लाख रुपये किराये का दावा

आरोप के मुताबिक, सादे कागज पर हुए समझौते के आधार पर प्रिंटर ने करीब 37 लाख रुपये मूल्य की डिग्रियां तैयार कर विश्वविद्यालय को उपलब्ध कराईं। इसके अतिरिक्त परिवहन अथवा किराये के नाम पर करीब 1.20 लाख रुपये का खर्च भी जोड़े जाने की बात कही जा रही है।

अब विवाद इस बात को लेकर है कि जब काम देने की मूल प्रक्रिया ही निर्धारित निविदा के बजाय नामांकन के आधार पर की गई, तो भुगतान किस नियम और किस वित्तीय स्वीकृति के आधार पर किया जाएगा। आरोप है कि कुलपति अब संबंधित प्रिंटर के भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

डिग्री छपाई में टेंडर की प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई गई?

विश्वविद्यालय में प्रश्नपत्रों की छपाई को लेकर गोपनीयता संबंधी प्रावधान होते हैं, लेकिन डिग्री प्रिंटिंग को उसी श्रेणी में नहीं रखा जाता। ऐसे काम के लिए सामान्य तौर पर विश्वविद्यालय की संबंधित वैधानिक समितियों की प्रक्रिया पूरी करने के बाद निविदा जारी कर योग्य प्रिंटर का चयन किया जाना चाहिए।

इसमें सेल एंड परचेज कमेटी और वित्त समिति समेत संबंधित संस्थागत निकायों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। आरोप है कि इस पूरी प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए उत्तर प्रदेश की कंपनी को सीधे काम दे दिया गया। यही वजह है कि अब विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली और वित्तीय निर्णयों को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

परीक्षा नियंत्रक की नियुक्ति भी विवादों में

डिग्री प्रिंटिंग का मामला विश्वविद्यालय के परीक्षा विभाग से जुड़े विवादों के साथ भी जुड़ रहा है। आरोप है कि कुलपति ने अजीत सेठ को राज्यपाल की मंजूरी के बिना परीक्षा नियंत्रक नियुक्त किया। साथ ही, पूर्व में राज्यपाल की स्वीकृति से नियुक्त परीक्षा नियंत्रक को निर्धारित अवधि से पहले पद से हटाए जाने का भी आरोप लगाया गया है।

पूरे मामले में परीक्षा नियंत्रक और उनके ओएसडी की भूमिका भी जांच के दायरे में आने की बात कही जा रही है। वहीं, विशेष ऑडिट टीम द्वारा संबंधित फाइल मांगे जाने के बावजूद उसे उपलब्ध नहीं कराने का आरोप भी गंभीर माना जा रहा है।

अब सवाल यह है कि डिग्री प्रिंटिंग का काम किस प्रक्रिया के तहत स्वीकृत हुआ, सादे कागज पर किया गया समझौता कितना वैध है और करीब 38.20 लाख रुपये के संभावित भुगतान का आधार क्या है। इन बिंदुओं की स्पष्टता विश्वविद्यालय के प्रशासनिक और वित्तीय कामकाज की पारदर्शिता के लिए अहम होगी।

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