Wednesday, October 7, 2026
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गोड्डा-पीरपैंती रेल लाइन पर हाईकोर्ट का फैसला, जमीन अधिग्रहण अधिसूचना रद्द करने से इनकार

by उर्वशी शेखर
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झारखंड हाईकोर्ट ने गोड्डा-पीरपैंती नई ब्रॉडगेज रेल परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण से जुड़ी 9 दिसंबर 2025 की अधिसूचना को चुनौती देने वाली जनहित याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता यह स्थापित नहीं कर पाए कि उन्होंने रेलवे अधिनियम के तहत निर्धारित समयसीमा के भीतर सक्षम प्राधिकारी के समक्ष वैध तरीके से अपनी आपत्तियां दाखिल की थीं।

मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने अशोक कुमार साह एवं अन्य की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ताओं ने अधिग्रहण की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए गोड्डा के मेहरमा प्रखंड के प्रभावित ग्रामीणों की जमीन को लेकर आपत्ति जताई थी।

याचिका में विशेष रूप से एसआरटी कॉलेज, धमरी के आसपास रेल लाइन के प्रस्तावित मार्ग में बदलाव की मांग की गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि एलाइनमेंट को करीब 400 से 750 मीटर पूर्व दिशा में स्थानांतरित किया जाए, जिससे परियोजना के कारण कम से कम आबादी और निजी जमीन प्रभावित हो।

आपत्तियों के समय पर दाखिल होने का प्रमाण नहीं

हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान अधिग्रहण की वैधानिक प्रक्रिया और याचिकाकर्ताओं की ओर से दाखिल दस्तावेजों की जांच की। अदालत के मुताबिक, 29 अगस्त 2025 को रेलवे अधिनियम की धारा 20-ए के तहत जमीन अधिग्रहण की मंशा से संबंधित अधिसूचना जारी की गई थी। इसका प्रकाशन स्थानीय समाचार पत्रों में भी कराया गया था।

कानूनी प्रावधान के अनुसार, प्रभावित व्यक्ति को अधिसूचना के प्रकाशन की तारीख से 30 दिन के भीतर सक्षम प्राधिकारी के समक्ष लिखित आपत्ति दर्ज कराने का अधिकार था। इसके बाद 9 दिसंबर 2025 को धारा 20-ई के तहत आगे की अधिसूचना जारी की गई।

खंडपीठ ने पाया कि याचिका के साथ पेश की गई आपत्तियों पर कोई तारीख अंकित नहीं थी। ये पत्र गोड्डा के उपायुक्त को संबोधित थे और विभिन्न अधिकारियों को उनकी प्रतियां भेजी गई थीं। लेकिन अदालत के सामने ऐसा कोई दस्तावेजी प्रमाण नहीं रखा जा सका, जिससे यह साबित हो कि आपत्तियां अधिसूचना में निर्धारित सक्षम प्राधिकारी के समक्ष समयसीमा के भीतर दाखिल की गई थीं।

अदालत ने यह भी कहा कि याचिका में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि संबंधित आपत्तियां 29 अगस्त की अधिसूचना जारी होने के बाद उसी के तहत निर्धारित प्रक्रिया के अनुपालन में दाखिल की गई थीं। ऐसे में केवल यह कहना कि ग्रामीणों की आपत्तियों पर विचार नहीं किया गया, अधिग्रहण संबंधी अधिसूचना को निरस्त करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है।

रेलवे लाइन का मार्ग बदलने पर भी अदालत ने दखल से किया इनकार

रेल लाइन के एलाइनमेंट में बदलाव की मांग को लेकर भी हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप करने से परहेज किया। अदालत ने कहा कि किसी रेलवे परियोजना का मार्ग निर्धारित करना तकनीकी और विशेषज्ञता से जुड़ा विषय है। ऐसे मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप का दायरा सीमित रहता है।

खंडपीठ ने हालांकि यह स्पष्ट किया कि याचिका खारिज किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि रेलवे अधिकारी ग्रामीणों के एलाइनमेंट बदलने के अनुरोध पर विचार नहीं कर सकते। यदि तकनीकी और व्यावहारिक परीक्षण के बाद प्रस्ताव उचित पाया जाता है, तो संबंधित रेलवे अधिकारी उस पर विचार करने के लिए स्वतंत्र होंगे।

अदालत ने साथ ही साफ किया कि उसके आदेश में रेलवे को एलाइनमेंट बदलने का कोई निर्देश नहीं दिया गया है।

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