Tuesday, October 6, 2026
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BRICS में भारत की पहल को मंजूरी, ‘नई दिल्ली घोषणापत्र 2026’ पर बनी सहमति

by उर्वशी शेखर
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नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों के बीच महत्वपूर्ण मुद्दों पर साझा सहमति बनाते हुए ‘नई दिल्ली घोषणापत्र 2026’ को सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्मेलन के दौरान घोषणापत्र का मसौदा सदस्य देशों के समक्ष प्रस्तुत किया। किसी भी सदस्य देश की ओर से आपत्ति नहीं आने के बाद इसे मंजूरी दे दी गई।

घोषणापत्र में आतंकवाद से मुकाबले से लेकर व्यापार, नवीकरणीय ऊर्जा और अंतरराष्ट्रीय विवादों तक कई विषयों पर BRICS देशों का साझा दृष्टिकोण सामने आया है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि दस्तावेज ने संगठन के सामूहिक प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए दिशा तय की है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वास्तविक सफलता घोषणाओं से नहीं, बल्कि उन्हें जमीन पर लागू करने से तय होगी।

आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख

BRICS देशों ने सीमा पार आतंकवाद, आतंकी संगठनों की आर्थिक मदद और आतंकियों को सुरक्षित ठिकाना उपलब्ध कराने की गतिविधियों की कड़ी आलोचना की। सदस्य देशों ने आतंकवाद के प्रति किसी भी तरह की नरमी नहीं बरतने की प्रतिबद्धता दोहराई।

घोषणापत्र में 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर में हुए आतंकी हमले की भी निंदा की गई। इसके साथ ही आतंकवादी गतिविधियों में शामिल लोगों को जवाबदेह ठहराने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर संयुक्त राष्ट्र के व्यापक सम्मेलन (CCIT) को जल्द आगे बढ़ाने और उसे पारित कराने की अपील भी की गई।

व्यापार और ऊर्जा पर भी साझा सहमति

BRICS देशों ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर भी अपनी चिंता जाहिर की। घोषणापत्र में एकतरफा व्यापारिक कदमों से पैदा होने वाली चुनौतियों का उल्लेख करते हुए सहयोग आधारित व्यापारिक व्यवस्था की जरूरत पर जोर दिया गया।

नवीकरणीय ऊर्जा को लेकर भी सदस्य देशों ने सहयोग मजबूत करने की बात कही। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी विवादों का समाधान सैन्य टकराव के बजाय संवाद, कूटनीति और शांतिपूर्ण तरीकों से किए जाने की आवश्यकता रेखांकित की गई।

नई दिल्ली घोषणापत्र के जरिए BRICS ने आतंकवाद, व्यापार, ऊर्जा और वैश्विक शांति जैसे मुद्दों पर सामूहिक रुख तो सामने रखा है। अब निगाहें इस बात पर होंगी कि सम्मेलन में बनी सहमति को सदस्य देश किस हद तक व्यावहारिक कदमों में बदल पाते हैं।

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