Table of Contents
झारखंड में 2014 बैच के IAS अधिकारी आशीष मोदी के जाति प्रमाण पत्र को लेकर उठे सवालों के बीच राज्य में सरकारी सेवा से जुड़े पुराने मामले भी चर्चा में आ गए हैं। केंद्र सरकार ने इस संबंध में झारखंड सरकार से जानकारी मांगी है। हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब किसी सरकारी अधिकारी की नियुक्ति में जाति प्रमाण पत्र या शैक्षणिक दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर सवाल खड़े हुए हों। राज्य में ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं, जिनकी जांच के बाद संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों को सेवा से बाहर किया गया।
झारखंड प्रशासनिक सेवा के अधिकारी सूर्य मणि आचार्य का मामला इसी कड़ी में उल्लेखनीय रहा। उन पर फर्जी प्रमाण पत्रों के आधार पर सरकारी सेवा में प्रवेश करने का आरोप लगा था। विभागीय जांच के दौरान आरोपों से जुड़े दस्तावेज और साक्ष्य सामने आने के बाद राज्य सरकार ने उनकी सेवा समाप्त कर दी।
इसी तरह झारखंड पुलिस सेवा से जुड़े अधिकारी मधुसूदन पर भी फर्जी प्रमाण पत्र के सहारे सेवा में नियुक्ति पाने का आरोप लगा था। जांच में आरोप प्रमाणित होने के बाद सरकार ने उनके खिलाफ बर्खास्तगी की कार्रवाई की।
JPSC चयन के बाद सामने आया रूपेश कुमार का मामला
चौथी JPSC परीक्षा के जरिए झारखंड प्रशासनिक सेवा में चयनित रूपेश कुमार का मामला भी दस्तावेजी फर्जीवाड़े से जुड़ा रहा। आरोप था कि उन्होंने पिछड़ा वर्ग-1 श्रेणी का गलत जाति प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर सरकारी नौकरी हासिल की। मामले की जांच के दौरान प्रमाण पत्र को लेकर अनियमितताएं सामने आईं। इसके बाद राज्य सरकार ने उनकी नियुक्ति समाप्त करने का फैसला लिया।

संदीप बख्शी: नियुक्ति के वर्षों बाद उठा ST प्रमाण पत्र पर सवाल
झारखंड प्रशासनिक सेवा के अधिकारी संदीप बख्शी के मामले में भी जातीय आरक्षण का लाभ लेने से जुड़े सवाल काफी बाद में सामने आए। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, 1993 में तत्कालीन उपायुक्त की ओर से उन्हें अनुसूचित जनजाति श्रेणी का प्रमाण पत्र जारी किया गया था। इसी प्रमाण पत्र के आधार पर 1999 में तत्कालीन बिहार प्रशासनिक सेवा, जो बाद में झारखंड प्रशासनिक सेवा का हिस्सा बनी, में उनका चयन हुआ।
ST आरक्षण के आधार पर सेवा में आने के बाद वे एसडीओ के पद तक पहुंचे। मामला तब सामने आया जब उन्हें अपर समाहर्ता के पद पर पदोन्नति दिए जाने की प्रक्रिया शुरू हुई। उनके अनुसूचित जनजाति प्रमाण पत्र की वैधता पर सवाल उठे और सरकार ने उनकी पदोन्नति पर रोक लगा दी।
फर्जी SC प्रमाण पत्र से नौकरी, सहायक अभियंता पर कार्रवाई
पथ निर्माण विभाग में सहायक अभियंता रहे शिव शंकर चौधरी पर भी आरक्षण का लाभ लेने के लिए गलत दस्तावेज इस्तेमाल करने का आरोप लगा था। बताया गया कि उन्होंने अपनी मां के नाम से जुड़े आधार पर अनुसूचित जाति श्रेणी का प्रमाण पत्र हासिल किया और उसका इस्तेमाल सरकारी नौकरी के लिए किया। मामला सामने आने के बाद विभागीय कार्रवाई हुई और अंततः उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल केवल प्रशासनिक या पुलिस सेवाओं तक सीमित नहीं रहा। डाक विभाग में भी ऐसे मामलों की पहचान हुई, जहां कर्मचारियों ने नियुक्ति के लिए दसवीं कक्षा के कथित फर्जी प्रमाण पत्र जमा किए थे। धनबाद डाक मंडल समेत दूसरे डाक मंडलों में हुई जांच के दौरान ऐसे कर्मचारियों के मामले सामने आए और दोषी पाए गए लोगों के खिलाफ बर्खास्तगी की कार्रवाई की गई।
इन पुराने मामलों से यह साफ होता है कि सरकारी नौकरी में आरक्षण का लाभ लेने या शैक्षणिक योग्यता साबित करने के लिए गलत दस्तावेजों का इस्तेमाल करने के मामले झारखंड में पहले भी सामने आते रहे हैं। अब आशीष मोदी के जाति प्रमाण पत्र को लेकर केंद्र की ओर से मांगी गई जानकारी के बाद एक बार फिर नियुक्तियों में प्रमाण पत्रों की जांच और उनकी वैधता का सवाल सुर्खियों में है।