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पश्चिमी ओडिशा की सांस्कृतिक पहचान से गहराई से जुड़ा नुआखाई पर्व केवल नई फसल के घर आने का उत्सव नहीं है, बल्कि कृषि, आस्था और सामाजिक एकजुटता का प्रतीक भी है। भाद्रपद शुक्ल पंचमी को मनाए जाने वाले इस पर्व का संबंध खेतों में तैयार हो रही धान की नई फसल से है। ‘नुआखाई’ का भावार्थ ही नए अन्न का सेवन करना है।
धान की बालियों के खेतों में दिखाई देने के साथ ही इस पर्व की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। मुख्य रूप से पश्चिमी ओडिशा के जिलों में किसानों और खेतिहर परिवारों के बीच इसकी विशेष महत्ता है, लेकिन समाज के लगभग सभी वर्ग इसमें समान उत्साह से शामिल होते हैं। पर्व के अवसर पर लोग रिश्तेदारों और परिचितों के घर पहुंचकर ‘नुआखाई जुहार’ करते हैं और आपसी मेल-मिलाप के लिए ‘भेंटघाट’ की परंपरा निभाते हैं।
नई फसल पहले देवी-देवताओं के नाम
नुआखाई की धार्मिक परंपरा में नई उपज को सबसे पहले ईश्वर को समर्पित करने की मान्यता है। अन्न की देवी अन्नपूर्णा समेत विभिन्न देवी-देवताओं की विधिवत पूजा की जाती है। अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय देवी-देवताओं की आराधना का विशेष महत्व है।
संबलपुर में समलेश्वरी देवी, बलांगीर-पटनागढ़ क्षेत्र में पटनेश्वरी देवी, सोनपुर में देवी सुरेश्वरी और कालाहांडी में देवी मानिकेश्वरी की विशेष पूजा होती है। सुंदरगढ़ में भी इस दिन राज परिवार द्वारा देवी शिखर वासिनी की आराधना की जाती है। यहां स्थित राज परिवार का मंदिर साल में केवल नुआखाई के अवसर पर ही श्रद्धालुओं के लिए खोला जाता है।
इसके अलावा गांवों में लोग अपने-अपने ग्राम देवता या ग्राम देवी की पूजा भी करते हैं। इस तरह स्थानीय आस्था और कृषि जीवन इस पर्व में एक साथ दिखाई देते हैं।
मुहूर्त तय करने की बदली परंपरा
पहले नुआखाई का आयोजन अलग-अलग गांवों में स्थानीय सुविधा के अनुसार अलग तिथियों पर किया जाता था। गांव के मुख्य पुजारी शुभ समय और पूजा की विधि निर्धारित करते थे। समय के साथ इस परंपरा में बदलाव आया और अब नुआखाई के लिए तिथि एवं शुभ मुहूर्त संबलपुर स्थित जगन्नाथ मंदिर के पुजारियों द्वारा निर्धारित किया जाता है।

पर्व से एक दिन पहले ही घरों में इसकी तैयारियां पूरी कर ली जाती हैं। नई धान की बालियां, चूड़ा, मूंग, परसा के पत्ते और पूजा में इस्तेमाल होने वाले फूल खरीदे जाते हैं।
इतिहास में भी मिलते हैं नुआखाई के सूत्र
पश्चिमी ओडिशा में नुआखाई की परंपरा को काफी पुराना माना जाता है और इसके संबंध वैदिक कृषि संस्कृति से भी जोड़े जाते हैं। हालांकि इसके आरंभ को लेकर इतिहास में अलग-अलग मत मिलते हैं। कुछ इतिहासकार लोकश्रुतियों के आधार पर इसकी परंपरा को 12वीं शताब्दी के चौहान शासक रमईदेव से जोड़ते हैं।
रमईदेव तत्कालीन पटनागढ़ के राजा थे, जो वर्तमान बलांगीर जिले का हिस्सा है। मान्यता के अनुसार उन्होंने लोगों को स्थायी कृषि व्यवस्था की ओर प्रेरित करने और उनके जीवन में स्थिरता लाने के उद्देश्य से धार्मिक अनुष्ठानों के साथ इस पर्व को प्रोत्साहित किया। बाद के दौर में नुआखाई पश्चिमी ओडिशा के लोकजीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।
‘नवान्हभोज’ में बंटता है नए अन्न का स्वाद
पर्व का सबसे खास हिस्सा नए धान से तैयार भोजन है। नई फसल के चावल से तरह-तरह के पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं। घरों के अलावा कई जगह सामूहिक रूप से भी ‘नवान्हभोज’ का आयोजन होता है।
पूजा के बाद नई फसल से तैयार भोजन का पहला भोग आराध्य देवी-देवताओं को अर्पित किया जाता है। प्रसाद ग्रहण करने के बाद परिवार और समुदाय के लोग साथ बैठकर भोजन करते हैं। इस सामूहिकता में केवल भोजन का आनंद नहीं, बल्कि सामाजिक संबंधों को मजबूत करने की भावना भी जुड़ी है।
अंत में लोग एक-दूसरे को ‘नुआखाई जुहार’ कहकर शुभकामनाएं देते हैं। नई फसल के स्वागत, देवी-देवताओं के प्रति कृतज्ञता और रिश्तों की गर्माहट के साथ नुआखाई का यह लोकपर्व पश्चिमी ओडिशा की समृद्ध कृषि और लोक संस्कृति की जीवंत तस्वीर पेश करता है।
हैदराबाद से विश्वनाथ देहाती की यह विशेष रिपोर्ट