Wednesday, October 7, 2026
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SIR पर चुनाव आयोग के भीतर मतभेद की रिपोर्ट से सियासी हलचल, CEC ज्ञानेश कुमार पर विपक्ष हमलावर

by उर्वशी शेखर
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मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद की एक रिपोर्ट सामने आने के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में आयोग के कई फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ये आपत्तियां मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने, फॉर्म-6 में बदलाव और चुनावी डेटा तक पहुंच जैसे मुद्दों से संबंधित थीं।

रिपोर्ट के अनुसार, दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने कुछ फैसलों को अपनी जानकारी या सहमति के बिना लिए जाने पर सवाल उठाए। उन्होंने चुनावी डेटा के प्रबंधन में बढ़ते केंद्रीकरण और राज्यों के स्तर पर अधिकारियों की डिजिटल पहुंच को लेकर भी चिंता जताई। हालांकि, चुनाव आयोग की ओर से यह कहा गया है कि SIR से जुड़े फैसले आयोग के स्तर पर लिए गए और प्रक्रिया को लेकर संस्थागत मतभेदों की रिपोर्ट के बीच आयोग ने सार्वजनिक रूप से संयुक्त रूप से भी काम किया है।

फॉर्म-6 और चुनावी डेटा पर उठे सवाल

रिपोर्ट में बताया गया है कि नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में SIR से संबंधित एक नया सवाल जोड़े जाने पर भी आपत्ति दर्ज की गई थी। निर्वाचन आयुक्तों की ओर से कथित तौर पर यह सवाल उठाया गया कि निर्धारित नियमों में बदलाव किए बिना वैधानिक फॉर्म में परिवर्तन कैसे किया जा सकता है।

इसके अलावा मतदाता सूची के डिजिटल डेटाबेस तक राज्य स्तरीय चुनाव अधिकारियों की पहुंच को लेकर भी चिंता सामने आई। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने चुनावी डेटाबेस के संभावित केंद्रीकरण और उसमें बदलाव करने के अधिकार को लेकर सवाल उठाए थे।

गोवा और पश्चिम बंगाल के मामलों का भी जिक्र

रिपोर्ट में गोवा का एक मामला भी सामने आया है, जहां सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद स्थानीय अधिकारियों ने 97 मतदाताओं को पात्र पाया था। रिपोर्ट के अनुसार, उस समय संबंधित सॉफ्टवेयर में इन मतदाताओं को दोबारा शामिल करने का विकल्प उपलब्ध नहीं था, जिसके कारण अंतिम मतदाता सूची में उनके नाम शामिल नहीं हो सके।

पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़े मामलों को लेकर भी चुनाव आयोग के भीतर सवाल उठने की बात रिपोर्ट में कही गई है। चुनाव आयोग ने हाल में सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि SIR के दौरान हटाए गए करीब 27.16 लाख मतदाताओं में से 22 लाख से ज्यादा ने नाम बहाल कराने के लिए अपील की है। कुल मिलाकर 38 लाख से अधिक अपीलें दाखिल हुई हैं।

कांग्रेस ने देशभर में प्रदर्शन का किया ऐलान

रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस ने देशभर में चुनाव आयोग के कार्यालयों के बाहर विरोध प्रदर्शन की घोषणा की है। नई दिल्ली में आयोग के कार्यालय के बाहर प्रस्तावित प्रदर्शन को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था भी बढ़ाई गई है। भारतीय युवा कांग्रेस की ओर से भी रायसीना रोड से जंतर-मंतर तक मार्च का कार्यक्रम बताए जाने की जानकारी सामने आई है।

वहीं, CJP के संयोजक अभिजीत दीपके ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है और निर्धारित समय में इस्तीफा नहीं होने पर जंतर-मंतर पर दोबारा प्रदर्शन की चेतावनी दी है। उन्होंने SIR की स्वतंत्र जांच, पिछली मतदाता सूची बहाल करने और मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव समेत तीन मांगें रखी हैं।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कांग्रेस पर साधा निशाना

विवाद के बीच छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी की चुनाव प्रक्रिया और चुनाव आयोग को लेकर की गई आलोचनाओं पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि चुनावी हार के बाद कांग्रेस को अपनी नीतियों और नेतृत्व की समीक्षा करनी चाहिए, लेकिन वह इसके बजाय चुनावी व्यवस्था पर सवाल उठा रही है।

साय ने आरोप लगाया कि चुनाव जीतने के दौरान कांग्रेस चुनाव व्यवस्था और EVM को लेकर अलग रुख रखती है, जबकि हार के बाद EVM, SIR और चुनाव आयोग पर सवाल उठाए जाते हैं।

जयराम रमेश ने राजीव गांधी के कार्यकाल का किया उल्लेख

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल का उल्लेख करते हुए मौजूदा राजनीतिक विवाद को युवाओं के मतदान अधिकार से जोड़ा। उन्होंने 1988 के संविधान संशोधन का हवाला दिया, जिसके तहत मतदान की न्यूनतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष की गई थी।

यह बदलाव संविधान (61वां संशोधन) अधिनियम, 1988 के जरिए हुआ था। जयराम रमेश ने इसे युवाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने वाला कदम बताया और वर्तमान चुनावी बहस के संदर्भ में इसका उल्लेख किया।

इस पूरे विवाद के बीच SIR की प्रक्रिया, मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने की व्यवस्था, चुनावी डेटाबेस के संचालन और चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली को लेकर राजनीतिक तथा संस्थागत बहस तेज हो गई है। आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों और उनसे जुड़े दस्तावेजों को लेकर आगे की स्थिति महत्वपूर्ण रहेगी।

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