Thursday, October 8, 2026
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झारखंड के बजट खर्च पर बड़ा सवाल! 1.42 लाख करोड़ के प्रावधान में वास्तविक व्यय 34 हजार करोड़ से भी कम

by उर्वशी शेखर
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झारखंड सरकार के चालू वित्तीय वर्ष के बजट प्रबंधन से जुड़ी तस्वीर कई सवाल खड़े कर रही है। कुल 1,42,019.37 करोड़ रुपये के बजट प्रावधान के मुकाबले अब तक वास्तविक खर्च 33,897.27 करोड़ रुपये दर्ज किया गया है। यानी बजट में रखी गई पूरी राशि की तुलना में धरातल पर खर्च का स्तर काफी कम है।

सरकारी स्तर पर विभिन्न विभागों और नियंत्रित पदाधिकारियों के लिए 88,427.86 करोड़ रुपये की स्वीकृति दी गई थी। इसमें से 62,677.27 करोड़ रुपये DDO को आवंटित किए गए और कोषागार से 57,192.98 करोड़ रुपये की निकासी भी हुई। हालांकि, अंतिम रूप से वास्तविक व्यय 33,897.27 करोड़ रुपये ही रहा। इससे स्वीकृति, निकासी और वास्तविक खर्च के बीच बड़ा अंतर सामने आता है।

महिला एवं बाल विकास विभाग सबसे आगे

विभागवार आंकड़ों में महिला, बाल विकास एवं सामाजिक सुरक्षा विभाग सबसे अधिक वास्तविक खर्च करने वाला विभाग रहा। इस विभाग ने 8,434.76 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। इसके बाद ऊर्जा विभाग का वास्तविक व्यय 4,249.79 करोड़ रुपये और स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के प्राथमिक एवं वयस्क शिक्षा प्रभाग का खर्च 3,481.42 करोड़ रुपये रहा।

इसके विपरीत पेंशन मद में 9,967.40 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान होने के बावजूद वास्तविक खर्च शून्य दर्ज किया गया। संसदीय कार्य प्रभाग में 0.62 करोड़ रुपये, आवास प्रभाग में 0.53 करोड़ रुपये और स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के सामान्य प्रभाग में 3.50 करोड़ रुपये का ही वास्तविक व्यय हुआ।

ग्रामीण विकास और बुनियादी ढांचे में भी अंतर

ग्रामीण और आधारभूत क्षेत्रों के आंकड़े देखें तो कई विभागों में कोषागार से निकासी के मुकाबले वास्तविक खर्च काफी कम रहा। ग्रामीण विकास विभाग के लिए 8,978.87 करोड़ रुपये का बजट था। 7,185.71 करोड़ रुपये की स्वीकृति और 5,778.93 करोड़ रुपये की निकासी के बावजूद वास्तविक व्यय 1,057.34 करोड़ रुपये रहा।

पथ निर्माण विभाग में 6,301.32 करोड़ रुपये के बजट के मुकाबले 989.69 करोड़ रुपये का वास्तविक खर्च दर्ज हुआ। वहीं ग्रामीण कार्य विभाग ने 4,156.74 करोड़ रुपये के बजट में से 1,960.86 करोड़ रुपये खर्च किए।

पेयजल एवं स्वच्छता विभाग का वास्तविक व्यय 163.90 करोड़ रुपये रहा, जबकि बजट 3,996.35 करोड़ रुपये का था। जल संसाधन विभाग में 2,132.24 करोड़ रुपये के प्रावधान के मुकाबले 790.17 करोड़ रुपये और लघु सिंचाई प्रभाग में 392.89 करोड़ रुपये के बजट के विरुद्ध 141.20 करोड़ रुपये खर्च हुए।

कृषि क्षेत्र में भी बजट और वास्तविक व्यय के बीच उल्लेखनीय अंतर दिखाई देता है। कृषि प्रभाग ने 2,106.36 करोड़ रुपये के बजट में से 155.85 करोड़ रुपये, पशुपालन प्रभाग ने 624.83 करोड़ में से 63.86 करोड़ रुपये और मत्स्य प्रभाग ने 220.17 करोड़ में से केवल 25.44 करोड़ रुपये खर्च किए। हालांकि, सहकारिता प्रभाग का वास्तविक व्यय 483 करोड़ रुपये रहा, जबकि उसका बजट 962.15 करोड़ रुपये था।

ऊर्जा विभाग का प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर

ऊर्जा विभाग इस सूची में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करने वाले विभागों में शामिल है। विभाग को 11,199.32 करोड़ रुपये का बजट मिला था, जिसमें से 5,047.50 करोड़ रुपये स्वीकृत हुए और 4,376.99 करोड़ रुपये की कोषागार निकासी हुई। वास्तविक खर्च 4,249.79 करोड़ रुपये दर्ज किया गया।

इसी तरह स्वास्थ्य विभाग में 6,164.57 करोड़ रुपये के बजट के मुकाबले 2,243.29 करोड़ रुपये खर्च हुए। उच्च शिक्षा प्रभाग ने 1,949.81 करोड़ रुपये के बजट में से 790.64 करोड़ रुपये का वास्तविक व्यय किया।

गृह विभाग में भी निकासी और खर्च के बीच अंतर

गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग के गृह प्रभाग का बजट 9,054.23 करोड़ रुपये था। इसमें 8,320.23 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए और 7,276.65 करोड़ रुपये कोषागार से निकाले गए। लेकिन वास्तविक खर्च 3,241.30 करोड़ रुपये रहा।

आपदा प्रबंधन प्रभाग में स्थिति और अलग रही। 1,296.26 करोड़ रुपये के बजट के मुकाबले 198.57 करोड़ रुपये स्वीकृत हुए, 50.92 करोड़ रुपये की निकासी हुई और वास्तविक व्यय महज 18.61 करोड़ रुपये दर्ज किया गया।

वित्तीय मदों में भी बजट के उपयोग का स्तर कम दिखाई देता है। 6,671.96 करोड़ रुपये के ब्याज भुगतान बजट के विरुद्ध वास्तविक खर्च 198.50 करोड़ रुपये रहा। वहीं 9,139.25 करोड़ रुपये के ऋण पुनर्भुगतान प्रावधान में वास्तविक व्यय 333.48 करोड़ रुपये दर्ज किया गया।

शिक्षा और कल्याण में बड़ी राशि, लेकिन खर्च का अनुपात अलग

महिला एवं बाल विकास विभाग के अलावा शिक्षा से जुड़े कुछ प्रभागों में भी बड़ी रकम खर्च हुई है। प्राथमिक एवं वयस्क शिक्षा प्रभाग ने 10,000.50 करोड़ रुपये के बजट में से 3,481.42 करोड़ रुपये खर्च किए। माध्यमिक शिक्षा प्रभाग का बजट 4,934.78 करोड़ रुपये था और वास्तविक व्यय 1,336.10 करोड़ रुपये रहा।

कल्याण प्रभाग में 2,240.46 करोड़ रुपये के बजट के मुकाबले 237.95 करोड़ रुपये और अल्पसंख्यक कल्याण प्रभाग में 319.20 करोड़ रुपये के प्रावधान के विरुद्ध 17.76 करोड़ रुपये का वास्तविक खर्च दर्ज किया गया।

परिवहन और योजना विभाग का खर्च बेहद कम

कुछ विभागों में बजट के मुकाबले वास्तविक खर्च का स्तर काफी नीचे रहा। परिवहन विभाग के लिए 348.94 करोड़ रुपये का बजट था, लेकिन वास्तविक व्यय सिर्फ 8.87 करोड़ रुपये रहा। योजना एवं विकास विभाग ने 540.14 करोड़ रुपये के बजट में से 35.16 करोड़ रुपये खर्च किए।

सूचना प्रौद्योगिकी एवं ई-गवर्नेंस विभाग में 395.51 करोड़ रुपये के बजट के मुकाबले 38.06 करोड़ रुपये, उद्योग विभाग में 501.30 करोड़ के मुकाबले 61.68 करोड़ रुपये और पर्यटन प्रभाग में 206.90 करोड़ रुपये के बजट के विरुद्ध 22.13 करोड़ रुपये का वास्तविक व्यय हुआ।

कुल आंकड़े यह संकेत देते हैं कि कई विभागों में राशि स्वीकृत होने और कोषागार से धन निकलने के बावजूद अंतिम स्तर पर खर्च की गति अपेक्षाकृत धीमी है। ऐसे में बजट प्रावधान, प्रशासनिक स्वीकृति, DDO को आवंटन, कोषागार निकासी और वास्तविक भुगतान के बीच मौजूद अंतर सरकार के वित्तीय प्रबंधन और योजनाओं के क्रियान्वयन की प्रभावशीलता पर महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है।

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