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झारखंड की आदिवासी परंपराओं से जुड़े प्रसिद्ध वाद्य यंत्र मांदर को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग की मान्यता मिल गई है। गुमला से शुरू हुई इस पहल को करीब पांच वर्षों के प्रयासों के बाद सफलता मिली है। भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री ने मांदर की पारंपरिक निर्माण पद्धति और क्षेत्रीय विशेषताओं के आधार पर प्रस्तुत दावे को स्वीकार कर लिया है। इस उपलब्धि से न केवल झारखंड की सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान मिलेगी, बल्कि मांदर तैयार करने वाले स्थानीय शिल्पकारों के लिए भी संभावनाओं के नए द्वार खुलेंगे।
मांदर को GI टैग दिलाने की मुहिम की शुरुआत गुमला जिले से हुई थी। इस प्रयास में पूर्व उपायुक्त कर्ण सत्यार्थी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। वे 28 जुलाई 2023 से 27 मई 2025 तक गुमला के उपायुक्त रहे। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने मांदर के सांस्कृतिक महत्व को सामने लाने के साथ इसके निर्माण में जुटे पारंपरिक कारीगरों की पहचान और उनके हुनर को प्रोत्साहित करने की दिशा में काम किया।
मांदर की क्षेत्रीय विशेषताओं और निर्माण से जुड़ी परंपराओं को आधार बनाकर GI मान्यता के लिए दावा प्रस्तुत किया गया। आवेदन से लेकर अंतिम स्वीकृति तक की प्रक्रिया में कई औपचारिकताओं और चुनौतियों का सामना करना पड़ा। लंबे प्रयासों के बाद अब भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री ने इस पारंपरिक वाद्य यंत्र को मान्यता प्रदान कर दी है।
सरहुल और करम जैसे पर्वों की पहचान है मांदर
झारखंड के जनजातीय समाज में मांदर का स्थान केवल एक वाद्य यंत्र तक सीमित नहीं है। इसकी गूंज राज्य की लोकपरंपराओं, सामूहिक उत्सवों और सामाजिक आयोजनों से गहराई से जुड़ी हुई है। सरहुल और करम जैसे प्रमुख त्योहारों से लेकर पारंपरिक नृत्य और लोकगीतों तक, मांदर की थाप सांस्कृतिक आयोजनों का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।
ग्रामीण क्षेत्रों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही इस परंपरा ने मांदर को झारखंड की सांस्कृतिक पहचान का प्रमुख प्रतीक बनाया है। विशेष रूप से आदिवासी समुदायों के सामूहिक नृत्य और उत्सवों में इसका महत्वपूर्ण स्थान है। GI मान्यता मिलने से इस विरासत के संरक्षण और व्यापक प्रचार-प्रसार को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
मांदर बनाने की पारंपरिक कला को भी मिली मान्यता
मांदर को GI टैग दिलाने के लिए इसकी निर्माण प्रक्रिया और स्थानीय कारीगरों के पारंपरिक कौशल को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया। गुमला से किए गए दावे में यह बताया गया कि किस प्रकार मांदर का निर्माण क्षेत्रीय शिल्पकला और झारखंड की सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा हुआ है।
इस मान्यता से मांदर की विशिष्ट पहचान को संरक्षित करने में सहायता मिलने की संभावना है। साथ ही, पारंपरिक निर्माण तकनीकों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने और इस व्यवसाय से जुड़े कारीगरों को प्रोत्साहित करने की दिशा में भी नए अवसर विकसित हो सकते हैं।

IAS हिमानी पांडे ने भी निभाई महत्वपूर्ण भूमिका
मांदर को GI मान्यता दिलाने की प्रक्रिया में झारखंड कैडर की 1998 बैच की IAS अधिकारी हिमानी पांडे का भी योगदान रहा। उन्होंने संबंधित विभागों और अधिकारियों के बीच तालमेल स्थापित करने तथा आवश्यक प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाने में सहयोग किया।
हिमानी पांडे वर्तमान में केंद्र सरकार के उद्योग विभाग में अतिरिक्त सचिव के पद पर कार्यरत हैं। इस पहल में उनके सहयोग और प्रशासनिक समन्वय की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
स्थानीय कारीगरों के लिए खुल सकते हैं रोजगार के नए रास्ते
GI टैग मिलने से मांदर के निर्माण और विपणन से जुड़े स्थानीय लोगों को आर्थिक लाभ मिलने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। इस मान्यता के माध्यम से मांदर की क्षेत्रीय विशिष्टता को स्थापित करने के साथ इसके बाजार का विस्तार करने में भी मदद मिल सकती है।
विशेष रूप से गुमला और झारखंड के अन्य क्षेत्रों में मांदर बनाने वाले पारंपरिक शिल्पकारों के लिए यह उपलब्धि महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। इससे उनके उत्पादों को व्यापक बाजार तक पहुंचाने, पारंपरिक कौशल को बढ़ावा देने और नई पीढ़ी को इस शिल्प से जोड़ने के अवसर पैदा हो सकते हैं।
देश-दुनिया तक पहुंचेगी झारखंड की सांस्कृतिक विरासत
मांदर को मिली GI मान्यता झारखंड की आदिवासी कला और लोकसंस्कृति को व्यापक स्तर पर प्रस्तुत करने का अवसर भी प्रदान करती है। इससे राज्य की पारंपरिक शिल्पकला और सांस्कृतिक विरासत के प्रति लोगों की रुचि बढ़ने की उम्मीद है।
करीब पांच वर्षों तक चली पहल की सफलता ने मांदर की क्षेत्रीय पहचान को औपचारिक मान्यता दिलाई है। अब इस उपलब्धि का लाभ स्थानीय कलाकारों और कारीगरों तक पहुंचाने तथा मांदर की पारंपरिक निर्माण कला को संरक्षित रखने की दिशा में आगे के प्रयास महत्वपूर्ण होंगे।