Tuesday, October 6, 2026
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CEC बनाम चुनाव आयुक्तों की कथित खींचतान के बीच अवमानना कार्रवाई की मांग

by उर्वशी शेखर
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मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर सामने आई एक मीडिया रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर विवाद और गहरा गया है। अब सुप्रीम कोर्ट के एक अधिवक्ता ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी से ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की अनुमति मांगी है। हालांकि, यह अभी केवल एक अधिवक्ता की ओर से की गई मांग है और इस पर आगे की कार्रवाई अटॉर्नी जनरल की सहमति तथा न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।

अधिवक्ता ब्रजेश सिंह ने 24 सितंबर को भेजे अपने पत्र में आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले दिए गए कुछ महत्वपूर्ण फैसलों का कथित रूप से पालन नहीं किया गया। उन्होंने अपनी मांग के समर्थन में कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट्स एक्ट, 1971 और सुप्रीम कोर्ट में अवमानना कार्यवाही से जुड़े 1975 के नियमों का हवाला दिया है।

टीएन शेषन के फैसले को बनाया आधार

ब्रजेश सिंह ने अपने पत्र में सुप्रीम कोर्ट के टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ मामले के फैसले का उल्लेख किया है। उनका तर्क है कि इस फैसले में चुनाव आयोग को बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था के तौर पर देखा गया था, जहां मुख्य चुनाव आयुक्त अन्य चुनाव आयुक्तों से ऊपर एकमात्र निर्णयकर्ता नहीं, बल्कि समान सदस्यों में प्रथम की भूमिका में होता है।

अधिवक्ता का आरोप है कि यदि आयोग के अन्य सदस्यों को दरकिनार कर फैसले या आधिकारिक सूचनाएं जारी की जाती हैं, तो यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित व्यवस्था से टकराने का मामला हो सकता है।

2023 के अनूप बरनवाल फैसले का भी हवाला

सिंह ने अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में 2023 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी अपने पत्र का आधार बनाया है। इस मामले में अदालत ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता के महत्व पर विस्तार से विचार किया था।

उनका कहना है कि संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून का पालन करना बाध्यकारी है और आयोग के किसी सदस्य को कथित तौर पर अलग रखकर निर्णय लेने की स्थिति इसकी अवहेलना का सवाल पैदा कर सकती है। यह फिलहाल अधिवक्ता द्वारा लगाया गया आरोप है, जिस पर किसी अदालत ने कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है।

14 मौकों पर आपत्ति की रिपोर्ट के बाद विवाद

अवमानना कार्रवाई की मांग ऐसे समय सामने आई है, जब एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर कुछ फैसलों को लेकर लिखित आपत्ति दर्ज की थी। रिपोर्ट में मतदाता पंजीकरण, मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने और चुनावी डेटा से जुड़े तकनीकी प्रबंधन जैसे मुद्दों का उल्लेख किया गया है।

इस रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठे हैं। हालांकि, आयोग से जुड़े सूत्रों ने इन खबरों में बताए गए मतभेद की व्याख्या अलग तरीके से की है। आयोग की ओर से कहा गया है कि संबंधित टिप्पणियां सुझाव और प्रक्रियागत इनपुट थे तथा पिछले एक वर्ष में लिए गए फैसले सर्वसम्मति से हुए।

अब ब्रजेश सिंह की मांग पर अटॉर्नी जनरल का रुख महत्वपूर्ण होगा। यदि अनुमति मिलती है, तभी सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक अवमानना की कार्यवाही आगे बढ़ाने का रास्ता खुलेगा। फिलहाल ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लगाए गए आरोप न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं हुए हैं।

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