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2018 में पूर्व मध्य रेलवे के पतरातू डीजल शेड में सामने आए रिश्वतखोरी के मामले में दो वरिष्ठ रेलवे अधिकारियों को रांची की विशेष अदालत ने दोषी करार देते हुए तीन-तीन वर्ष के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई। आरोप था कि ठेकेदार के लंबित भुगतान की फाइल आगे बढ़ाने के बदले दोनों अधिकारियों ने रिश्वत की रकम मांगी थी।
मामला एक ठेकेदार के 6.26 लाख रुपये के लंबित बिल से जुड़ा था। भुगतान हासिल करने के लिए लगातार कार्यालय के चक्कर काट रहे ठेकेदार नरेश कुमार सिंह से कथित तौर पर रिश्वत की मांग की गई। आरोप के मुताबिक, सहायक सामग्री प्रबंधक कैलाश कांत झा ने 17 हजार रुपये, जबकि वरिष्ठ मंडल यांत्रिक इंजीनियर राजेश्वरी सिंह ने 45 हजार रुपये की मांग की थी।
शिकायत के बाद CBI ने तैयार किया ट्रैप
रिश्वत की मांग से परेशान ठेकेदार ने मामले की शिकायत भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसी से की। शिकायत की जांच के बाद CBI ने दोनों अधिकारियों को पकड़ने के लिए ट्रैप की योजना तैयार की। इसके तहत रिश्वत की रकम पर फिनोलफ्थलीन पाउडर लगाया गया, ताकि पैसे के संपर्क में आने वाले व्यक्ति की पहचान वैज्ञानिक तरीके से की जा सके।

29 अगस्त 2018 को ठेकेदार निर्धारित योजना के तहत अधिकारियों के कार्यालय पहुंचा। आरोप के अनुसार, बातचीत के बाद दोनों अधिकारियों ने रिश्वत की रकम स्वीकार कर ली। इसी दौरान CBI की टीम स्वतंत्र गवाहों के साथ वहां पहुंच गई और कार्रवाई शुरू कर दी।
अचानक छापे से घबराए, रकम इधर-उधर फेंकी
CBI टीम के सामने आते ही दोनों अधिकारियों ने कथित तौर पर रिश्वत की रकम से खुद को अलग करने की कोशिश की। कैलाश कांत झा ने नोटों को मेज के पीछे और फर्श की ओर फेंक दिया। वहीं राजेश्वरी सिंह ने भी अपनी मेज पर रखी रकम को दूर सरका दिया और रिश्वत लेने से इनकार किया।
बचाव पक्ष ने अदालत में इसी तथ्य को आधार बनाते हुए तर्क दिया कि अधिकारियों के पास से सीधे पैसे बरामद नहीं हुए थे। लेकिन अभियोजन पक्ष ने वैज्ञानिक जांच और प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के बयानों के जरिए इस दलील को चुनौती दी।
फिनोलफ्थलीन टेस्ट बना अहम सबूत
CBI के वरीय लोक अभियोजक प्रियांशु सिंह ने अदालत के समक्ष वैज्ञानिक साक्ष्यों को प्रमुख आधार बनाया। ट्रैप से पहले नोटों पर लगाए गए फिनोलफ्थलीन पाउडर के संपर्क में आने के बाद अधिकारियों के हाथों और शर्ट की जेब से लिए गए नमूनों की जांच की गई। सोडियम कार्बोनेट घोल से किए गए परीक्षण में घोल का रंग गुलाबी हो गया।
कोलकाता स्थित फॉरेंसिक प्रयोगशाला की रिपोर्ट ने भी अधिकारियों के नोटों के संपर्क में आने की पुष्टि की। अभियोजन के मुताबिक, यह वैज्ञानिक साक्ष्य इस बात को साबित करने में महत्वपूर्ण रहा कि रकम को अधिकारियों ने छुआ था।

गवाहों और कॉल रिकॉर्ड ने मजबूत किया अभियोजन का मामला
मामले में स्वतंत्र गवाहों के बयान भी अदालत में दर्ज किए गए। गवाहों ने कथित तौर पर रिश्वत की रकम दिए जाने और CBI की टीम के पहुंचने के बाद अधिकारियों द्वारा नोटों को फेंकने की घटना की पुष्टि की।
इसके अलावा कॉल डिटेल रिकॉर्ड, फॉरेंसिक रिपोर्ट और मौके पर मौजूद गवाहों की गवाही को भी अदालत ने साक्ष्य के रूप में देखा। इन सभी तथ्यों के आधार पर विशेष अदालत ने कैलाश कांत झा और राजेश्वरी सिंह को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषी माना।
अदालत ने दोनों अधिकारियों को तीन-तीन वर्ष के कठोर कारावास के साथ जुर्माने की सजा सुनाई। इस तरह रिश्वत की रकम को फर्श पर फेंककर उससे दूरी दिखाने की कोशिश भी वैज्ञानिक साक्ष्यों और गवाहों के सामने काम नहीं आई।