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झारखंड में जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच समन्वय और जवाबदेही को लेकर नई बहस शुरू हो सकती है। राज्य के वित्त, योजना एवं विकास, वाणिज्य-कर और संसदीय कार्य मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र भेजकर विधायकों के विशेषाधिकार से जुड़े प्रावधानों में बदलाव की मांग की है। उनका सुझाव है कि विधायक विशेषाधिकार को केवल सदन के भीतर की कार्यवाही तक सीमित रखने के बजाय प्रशासन के साथ उनके आधिकारिक संवाद को भी इसके दायरे में शामिल किया जाए।
मंत्री ने विधानसभा की कार्य संचालन नियमावली में आवश्यक संशोधन का सुझाव देते हुए कहा है कि यदि कोई सरकारी अधिकारी या कर्मचारी जनप्रतिनिधि के साथ अनुचित व्यवहार करता है या उनके माध्यम से उठाए गए जनहित के मामलों की जानबूझकर अनदेखी करता है, तो ऐसी परिस्थितियों को विशेषाधिकार के प्रश्न से जोड़ने की व्यवस्था होनी चाहिए।
पत्रों का जवाब नहीं मिलने और फोन नहीं उठाने की शिकायत
मंत्री के मुताबिक, विधायकों के सामने अक्सर ऐसी स्थिति आती है जब उनके द्वारा अधिकारियों को भेजे गए पत्रों का समय पर जवाब नहीं मिलता। कई बार फोन पर संपर्क करने की कोशिश के बावजूद अधिकारियों से बात नहीं हो पाती। इसके अलावा जनता से जुड़े मामलों और विधायकों की ओर से दिए गए सुझावों पर भी अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाए जाने की शिकायतें सामने आती रही हैं।

राधाकृष्ण किशोर ने कहा कि जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र की समस्याओं को सरकार और प्रशासन तक पहुंचाने की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। ऐसे में उनके माध्यम से सामने आने वाले जनहित के मामलों पर प्रशासनिक स्तर पर उचित प्रतिक्रिया मिलना जरूरी है।
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि सरकार की ओर से अधिकारियों को समय-समय पर निर्वाचित प्रतिनिधियों के साथ मर्यादित एवं समुचित व्यवहार करने तथा उनके पत्रों पर आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए जाते रहे हैं। इसके बावजूद शिकायतों में कमी नहीं आना चिंता का विषय है।
अशिष्ट व्यवहार पर विशेषाधिकार हनन का प्रावधान
मंत्री ने नियमावली में ऐसी व्यवस्था विकसित करने का सुझाव दिया है, जिसके तहत किसी विधायक के साथ अधिकारी या कर्मचारी द्वारा कथित अपमानजनक अथवा अशिष्ट व्यवहार किए जाने पर कार्रवाई की जा सके। जानबूझकर जनहित से जुड़े किसी मामले को लंबित रखना या नजरअंदाज करना भी प्रस्तावित व्यवस्था के तहत विचारणीय हो सकता है।
हालांकि, मंत्री ने इस प्रस्ताव को विधायकों के लिए प्रशासन पर दबाव बनाने के साधन के रूप में इस्तेमाल किए जाने के पक्ष में नहीं रखा है। उनका जोर संस्थागत सम्मान, पारस्परिक जवाबदेही और बेहतर समन्वय पर है।
विधायकों के लिए भी जवाबदेही का प्रस्ताव
इस मांग का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मंत्री ने केवल अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने की बात नहीं कही है। उन्होंने व्यवस्था को दोतरफा जवाबदेही पर आधारित करने का सुझाव दिया है।
उनके अनुसार, यदि कोई विधायक किसी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी के साथ अभद्र व्यवहार करता है या अपने पद का अनुचित इस्तेमाल करता है, तो उसके खिलाफ भी नियमों के अनुरूप कार्रवाई का प्रावधान होना चाहिए। यानी प्रस्तावित बदलाव में जनप्रतिनिधियों के अधिकारों के साथ उनके आचरण की जिम्मेदारी को भी जोड़ा गया है।

मंत्री का मानना है कि ऐसी व्यवस्था अधिकारियों और विधायकों के बीच अनावश्यक टकराव को कम कर सकती है और प्रशासनिक कामकाज में बेहतर संवाद की गुंजाइश पैदा कर सकती है।
क्या होता है विधायकों का विशेषाधिकार?
विधानसभा के सदस्यों को अपने विधायी दायित्वों का स्वतंत्र रूप से निर्वहन करने के लिए कुछ विशेष अधिकार और संरक्षण प्राप्त होते हैं। इनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विधायक बिना अनुचित दबाव या बाहरी हस्तक्षेप के सदन में अपनी बात रख सकें।
सदन में कही गई बात और मतदान से जुड़े मामलों में विधायकों को विशेष संरक्षण हासिल है। इसके अलावा विधानसभा की कार्यवाही, समितियों के कामकाज या सदन की गरिमा में हस्तक्षेप जैसे मामलों में भी विशेषाधिकार का सवाल उठ सकता है। किसी कथित विशेषाधिकार हनन की शिकायत आने पर विधानसभा की निर्धारित प्रक्रिया के तहत उस पर विचार किया जा सकता है।
अब राधाकृष्ण किशोर के प्रस्ताव ने इस बहस को सदन की चारदीवारी से बाहर विधायक-अधिकारी संबंधों और प्रशासनिक जवाबदेही तक पहुंचा दिया है। हालांकि, नियमावली में किसी तरह का बदलाव करना है या नहीं, इसका अंतिम निर्णय विधानसभा की निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही होगा।